Monday, April 18, 2011

बैग में लाश

लड़के और लड़कियों में चाहे हम जितनी समानताएं ढूंढें, प्राकृतिक तौर पर दोनों का स्वभाव इतना जुदा है कि उसे पाट पाना लगभग असंभव है। नए जमाने का खुलापन, सुप्रीम कोर्ट की शह और समाज के उकसावे में आकर लड़कियों ने जो राह अपने लिए चुनी है वह खुद उनके लिए कभी भी कब्र खोद सकती है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता का मानना है कि स्त्रियों को समझना बेहद मुश्किल होता है और पुरुषों के लिए तो उन्हें समझ पाना लगभग असंभव होता है। लड़के आसानी से लड़कियों की फ्लर्टिंग के शिकार हो जाते हैं। कुछ लड़के तो इतने बेवकूफ होते हैं कि लड़की ने उन्हें बर्थ-डे विश कर दिया तो उनके मन में लड्डू फूटने लगता है। कभी हाथ पकड़ लिया, एक धौल जमा दिया या गाल पर चिकोटी काट ली तो वह उसे प्यार समझ बैठता है। फिर जब एक दिन वह प्रणय निवेदन करता है तो बड़ी सहजता से कह देती है कि उसने उसे कभी इस नजर से नहीं देखा। यहीं आकर लड़का कन्फ्यूज हो जाता है। भावनाओं को हैण्डल करने में लड़के अकसर अनाड़ी साबित होते हैं। ठुकराए जाने पर या तो वे डिप्रेशन में चले जाते हैं या फिर आक्रामक हो जाते हैं. दिल्ली में हाल ही में बैग में मिली लाश के पीछे भी कमोबेश यही कहानी नजर आती है। लड़की खुलेपन की इतनी कायल थी कि वह एक युवक के साथ लिव इन रिलेशन में थी। यही नहीं वह कई अन्यों के साथ फ्लर्ट भी करती थी। हो सकता है, उसे यह स्वाभाविक लगता हो और युवावस्था की डिमांड लगती हो किन्तु यह भी उतना ही स्वाभाविक है कि कोई उसके प्यार में वाकई अंधा हो गया हो। प्यार में ठुकराए जाने पर या धोखा खाने पर युवकों में बहुत कम प्रतिशत ऐसे लोगों का होता है जो कविता या गजल लिखने बैठ जाते हैं। कुछ और भूखा रहकर, शराब पीकर या सिगरेट पीकर खुद को प्रताड़ित कर अपनी स्थियि दयनीय बनाने की कोशिश करते हैं ताकि कोई तो उसपर तरस खाए। पर इससे परे अधिकांश ठुकराए गए युवाओं का रिएक्शन वायलेंट होता है। वे लड़की को बदनाम करने की कोशिश करते हैं। उसके बारे में अनर्गल बातें करने लगते हैं। क्लासरूम में, स्कूल-कालेज, ट्रेन या बार के टायलेट में उसका नाम और टेलीफोन नम्बर लिख देते हैं। लड़की को जलील और बदनाम करने की कोशिश करते हैं। वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं जो वह खूबसूरत चेहरा जला देने की कोशिश करते हैं जिसने उसकी कथित जिन्दगी तबाह की। अब तक बहुत कम ही सही पर कुछ लोग हत्या तक कर रहे हैं। चिंता की बात यह है कि ऐसे लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इस संदर्भ में ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ की याद आती है। इस फिल्म में एक ऐसे युवक को दिखाया गया है जो अपने प्यार से धोखा खाकर अपनी जिन्दगी का अंत कर देना चाहता है। मजाक-मजाक में ही ‘मुन्ना भाई’ उसे समझाने की कोशिश करते हैं कि एक गई तो दूसरी आ जाती है। नाच गाकर माहौल को हलका फुलका करने की कोशिश भी की गई है। पर इसी फिल्म में, यही मुन्नाभाई किसी एक के प्यार में खोया हुआ था। भावनाओं और भावुकता के बारे में उपन्यासकार, कहानीकार और प्रवचनकार चाहे जो कहते हों किन्तु हकीकत यही है कि भावावेग पुरुषों में अधिक होता है। हो सकता है कि इसकी अभिव्यक्ति में वे कमजोर होते हों, बात-बात पर आंसू बहाना उन्हें मंजूर न हो किन्तु इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वे भावनाशून्य होते हैं। इसलिए सभ्य समाज पुरुषों की भावनाओं से खिलवाड़ बंद करे अन्यथा वे कानून बनाते रह जाएंगे और बैग में बंद लाशें बरामद होती रहेंगी।

No comments:

Post a Comment