Monday, April 18, 2011

डॉ बिनायक सेन

बहुत साल पहले की बात है। मोहल्ले का ही एक शराबी अपनी पत्नी को बेतहाशा पीट रहा था। लहूलुहान होने के बावजूद उसकी पत्नी अपने मुंह से एक आवाज नहीं निकाल रही थी। प्रत्येक लात और घूंसे पर उसके मुंह से एक घुटी घुटी सी चीख निकलने को होती और फिर वहीं घुट कर रह जाती। इससे उसके जिंदा होने का अहसास मात्र होता था। हमसे रहा न गया तो हमने उसके पति को रोकने की कोशिश की। जवाब मिला, ‘जाकर अपना काम करो। मेरे घर में दखलअंदाजी करने का तुम्हें कोई हक नहीं। मैं अपनी बीवी को पीट रहा हूँ। तुम्हें क्या? इसके यार लगते हो?’ बात बढ़े इससे पहले ही हम वहां से परे हट गए। पर मन ही मन सोचा कि काश यही सवाल पुलिस ने किया होता। हमने किसी तरह पुलिस तक यह बात पहुंचा दी। कुछ-कुछ ऐसा ही मामला छत्तीसगढ़ में नक्सली उन्मूलन का है। भयभीत पड़ोसियों की जुबान पर ताला है। उन्हें डर है कि विरोध या बीच बचाव करने पर स्वयं उन्हीं पर लांछन लगाया जा सकता है। डॉ बिनायक सेन के मामले में यह उदाहरण एकदम फिट बैठता है। यहां आक्रांता शराबी नहीं पर मदहोश है। चुनावी सफलताओं ने उसके मनोबल को खतरनाक होने की हद तक बढ़ा दिया है। आंकड़ों से मिली शाबासी ने उसे आत्ममुग्ध कर दिया है। उसे लगता है कि उसका हर फैसला दुरुस्त है और किसी को भी उसमें दखलअंदाजी करने का हक नहीं है। दंतेवाड़ा में गांधीवादी समाज सेवी हिमांशु कुमार ने वनवासियों का साथ दिया तो उनका आश्रम उजाड़ दिया गया। दल्लीराजहरा क्षेत्र में पिछले कई दशकों से आदिवासियों, माइंस श्रमिकों एवं पिछड़े गरीबों के बीच काम कर रहे बिनायक सेन से नक्सलियों ने सम्पर्क किया तो उसने बिनायक सेन को ही उठवा लिया। ज्ञात अज्ञात तरीकों से उसे ही देशद्रोही करार दे दिया। देर से ही सही पर सर्वोच्च न्यायालय के रूप में पुलिस आई। उसने बिना किसी पूर्वाग्रह के मामले को देखा और दूध का दूध पानी का पानी कर दिया। यहां एक बात हमेशा स्मरण रखने की है। लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च है। उसकी सोच, उसकी समझ और उसका विवेक स्वतंत्र है। हमें उनकी चिंताओं को दूर करना होगा। उनकी सोच में सकारात्मक परिवर्तन लाना होगा। उनका मुंह बंद करके हम लोकतंत्र को मजबूत नहीं कर सकते। आज मामला घर के अंदर का है। घर वाले ही विरोध में मुंह खोल रहे हैं जिनके साथ मिल बैठकर चर्चा की जा सकती है। यदि हमने उन्हें बोलने नहीं दिया, बहस से डरते रहे तो कल को बात खुलेगी और दूर तक जाएगी। फिर किस किस का मुंह बंद करते फिरेंगे? आज शासन और प्रशासन के भय और राज्य की मर्यादा के चलते लोग संयम के साथ अपनी बात रख रहे हैं। कल को जब बाहर के लोग नरसंहार और जनसंहार जैसे शब्दों का उपयोग करने लगेंगे तब यही चमचमाता चेहरा छिपाने को जगह नहीं मिलेगी। सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप सही समय पर आया है किन्तु वह किसी तरह की जांच का आदेश देने के लिए मजबूर हो जाए इससे पहले ही हमें अपना घर संभालना होगा। सरकार को भी समझना होगा कि सुरक्षा और शांति के लिए जनता कहीं अधिक फिक्रमंद है क्योंकि उसके आसपास कोई सुरक्षा घेरा नहीं है। उसकी चिंताए स्वाभाविक और सत्य हैं। जनता ही प्रदेश है, प्रदेश ही जनता है।

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