Sunday, January 9, 2011
सरकारी आतंकवाद
सभ्य समाज उनकी बातें नहीं सुनना चाहता। प्रशासन भी मुंह फेर लेता है। कानून उनकी भाषा नहीं समझता। संविधान उन्हें दृष्टि में रखकर नहीं लिखा गया। वे संख्या में कम हैं किन्तु उनके अंदर भी एक आग जल रही है। इस आग की आंच एटमी फ्यूजन से ज्यादा तेज है। इसकी आंच में वे खुद लंबे समय से दग्ध होते रहे हैं। अब इसकी लपटें औरों को भी झुलसाकर मारना चाहती हैं। वे मुट्ठीभर हैं। इसलिए वे छापामार युद्ध लड़ रहे हैं। वे चोरी या तस्करी के हथियारों का उपयोग कर रहे हैं। दुश्मनों के हथियार उठा कर उसका उपयोग कर रहे हैं। उन्हें कफन की परवाह नहीं। उन्हें कदाचित इसकी भी फिक्र नहीं कि उन्हें कब्र मिलती है या चिता। वे बेखौफ हैं। वे आत्माभिमानी हैं। किसी की दादागिरी नहीं झेल सकते फिर चाहे वह प्रशासन ही क्यों न हो। दरअसल यह सभ्य समाज के लिए आत्ममंथन का वक्त है। हम यह तर्क दे सकते हैं कि सरकार या प्रशासन कानून के दायरे में रह कर काम कर रहे हैं। वे वृहदतर समाज के हित में काम कर रहे हैं। वे आम जनता, राज्य और देश के अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। पर क्या ये दलीलें सही हैं? जिस किसी का भी किसी सरकारी आफिस से पाला पड़ा है, जरा उसकी राय पूछिए। थाने में रिपोर्ट लिखानी हो, बिजली विभाग में आपत्ति दर्ज करानी हो, स्कूल में बच्चे को एडमिशन दिलाना हो, राशन कार्ड हासिल करना हो, अस्पताल में मरीज को दाखिल कराना हो, अदालत में याचिका दायर करनी हो, बस या ट्रेन में सफर करना हो, हर जगह आम आदमी को याचक की भूमिका में रहना पड़ता है। सरकारी कर्मचारी बनते ही आदमी ‘दादा’ बन जाता है। उसके जो मुंह में आए वह बक सकता है। माँ बहन की गालियां दे सकता है। कपड़े उतरवाकर पट्टे लगवा सकता है। पर आप विरोध तक नहीं कर सकते। यदि आपने उसकी मेज भी जोर से थपथपा दी तो आपके खिलाफ सरकारी काम में दखलअंदाजी करने का जुर्म कायम हो सकता है। हाँ! यह कहेंगे कि न्याय के रास्ते खुले हैं किन्तु किसके लिए? अव्वल तो कोई रिपोर्ट ही नहीं लिखेगा। लिख भी लिया तो उसपर कार्यवाही नहीं होगी। मामला अदालत भी चला गया तो पता नहीं कितने सालों में फैसला आएगा। इतना वक्त आम आदमी के पास नहीं है। उसका बीमार बच्चा, उसकी पकी हुई फसल, हवालात में बंद उसकी बेकसूर बीवी या पति के लिए पल-पल दोजख की आग जैसी है। तो फिर गलती कहां है? इसके बारे में सोचना होगा। यह आत्ममंथन का वक्त है। वरिष्ठ आदिवासी नेता नंदकुमार साय ठीक ही कहते हैं कि बातचीत से नक्सल समस्या का सौ प्रतिशत हल संभव नहीं है। क्योंकि वे जानते हैं कि आदिवासी या नक्सली तो अड़ियल हैं ही, सरकार भी कुछ कम नहीं है।
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