Monday, April 18, 2011

एक मच्छर आदमी को...

‘एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है..’ यह एक फिल्मी डायलॉग हो सकता है किन्तु इसका एक और पहलू भी है। मच्छर लाखों लोगों को रोजी रोटी का साधन भी उपलब्ध कराता है। यह एक बड़ा व्यवसाय है जिसमें काफी पैसा है। एक समय था गरीब आदमी सिर तक को चादर से ढांप कर सोता था। माताएं बच्चे को अंडी की साड़ी में लपेट कर सुलाती थीं। फिर आई मच्छरदानी। पहले बनी कपड़े की और फिर नाइलोन की मच्छरदानियां भी आ गर्इं। मच्छरों से बचने का यह संभवत: सर्वाधिक निरापद और प्रभावशाली तरीका है। पर सभी बंधनों को तोड़कर भाग रहे इंसान की फितरत को यह मंजूर नहीं था। इसलिए उसने मच्छरों को मारने के लिए जहर ईजाद की और उसका शिकार मच्छरों के साथ साथ खुद भी होता चला गया। मच्छरों ने तो कुछ ही समय में अपना अनुकूलन कर लिया और फिर जहर पीकर वह पहले से कहीं ज्यादा मोटा तगड़ा और आक्रामक हो गया। अलबत्ता इंसानों को दुनिया भर की बीमारियों ने घेर लिया। इसी सब से उपजा मच्छरों पर आधारित व्यवसाय। अब प्रतिदिन मच्छरों से लड़Þने का एक नया हथियार बाजार में आ रहा है। साइथियान, मेलाथियान, साइक्लोथ्रिन जैसी जहर बुझी अगरबत्तियां, छिड़काव की दवाएं और वेपराइजर बाजार में हैं। प्रतिवर्ष इनमें एक्स्ट्रा पावर जोड़ा जा रहा है। मच्छर छाप अगरबत्तियों को स्मोक लेस किया जा रहा है। उन्नयन के साथ साथ इसकी कीमतों में भी उछाल आ रहा है और आज मच्छारों के खिलाफ हमारे अभियान का खर्च घरेलू बजट से लेकर नगर निगम, राज्य शासन यहां तक कि केन्द्र सरकार के बजट में भी दिखने लगा है। यह एक ऐसा युद्ध है जिसमें हमारी शायद ही कभी जीत होगी। जनसंख्या का घनत्व बढ़ने के साथ-साथ साफ सफाई एक बड़ी समस्या बनकर उभरी हैं। खुली नालियां, जहां-तहां जमा पानी, जितने घर उतने ही सेप्टिक टैंक ने मच्छरों के ब्रीडिंग सेन्टर्स में कई गुना इजाफा कर दिया है। तालाबों के लिए गम्बूजिया मछलियों की भी चर्चा होती रही जो मच्छरों का लार्वा खाने के लिए प्रसिद्ध हैं। पर वह भी मच्छरों को निर्मूल नहीं कर सकती थीं। मच्छर वाटरप्रूफ सेप्टिक टैंकों में पनपते रहे और शाम होते ही गैस पाइप से निकलकर बाहर आते रहे। मच्छर निर्मूलन या युद्ध हार चुकने के बाद अब हम डिफेन्सिव हो गए हैं। घरों में दो-दो पल्ले लगने लगे हैं - एक लकड़ी पल्ला तो दूसरा जाली पल्ला। खिड़कियों में जाली लग गई है। बिजली के साकेट में आल-आउट गुडनाइट फंसे हैं पर नाइट है कि गुड हो ही नहीं रही। लिहाजा शरीर पर मलहम पोतकर सो रहे हैं। पलंग के नीचे स्मोकलेस कायल जल रहा है। विज्ञान ने मलेरिया का निदान तो बहुत साल पहले ढूंढ लिया था किन्तु अब फैल्सिपेरम मलेरिया ने उसके वजूद को हिला कर रख दिया है जिसमें अकसर डाक्टर को कुछ करने का मौका ही नहीं मिलता। मच्छरों के खिलाफ लड़ाई हम तेजी से हार रहे हैं फिर भी ड्रेनेज, बेकार बहकर जमा हुआ पानी हमारी नजरों को आकर्षित नहीं कर रहा। हम इतने लीचड़ हो गए हैं कि शायद भगवान को भी अब हमसे घृणा हो गई है। विज्ञान ने जिन्दगी तो लंबी कर दी है किन्तु उसका अधिकांश हिस्सा आज जीने लायक नहीं रहा।

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