Monday, April 18, 2011
तुम क्यों नहीं मरे सुनील
जिस दिन से तुमने आंदोलन शुरू किया था, लोग यही कह रहे थे कि तुम नौटंकी कर रहे हो। ऐसी गीदड़ भभकियां देने वालों को वे खूब पहचानते हैं। वे कहते थे, ‘कुछ नहीं होने वाला’। पर जब सुबह-सुबह खबर आई कि तुम सबने जहर खा लिया है तो पूरे शहर को गहरा सदमा पहुंचा। लोगों को अपने कानों पर यकीन नहीं आ रहा था। एकाएक उनके आक्रोश की दिशा बदल गई थी। वह बीएसपी को, पुलिस प्रशासन को कोसने लगे थे। उन्हें यकीन हो चला था कि तुम नौटंकी नहीं कर रहे थे, तुम्हारी बातों में दम था। पर थोड़ी ही देर में यह भी खबर आ गई कि तुमने जहर नहीं खाया है। और जनभावना पहले से कहीं अधिक मुखर होकर फिर तुम्हें कोसने लगी। लोगों का गुस्सा लौट कर तुम्हारी तरफ आ गया। अब वे पहले से कहीं अधिक जोश के साथ तुम्हें कोस रहे थे। कोई इसे सोची समझी साजिश बता रहा था तो कोई जवान बहनों और माँ के बोझ से मुक्ति पाने का नया तरीका। कुछ ही दीवाने हैं जिन्हें आज भी ऐसा लगता है कि तुम्हारे पिता ही नहीं बल्कि तुम्हारे पूरे परिवार की हत्या की गई है। ऐसा मानने वालों में वे परिवार शामिल हैं जिनके मुखिया या तो बीमार हैं या मर चुके हैं। इन परिवारों में बेटियां घासफूस की तरह बढ़ रही हैं, बेटे बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। इनके यहां अर्थ अभाव के चलते बेटियां अधेड़Þ हो चुकी हैं। समाज को उनसे सहानुभूति तो है किन्तु ऐसे परिवार नहीं हैं जो बिना दहेज के उन्हें बहू बनाने को तैयार हों। समाज उन्हें स्लो पॉयजन दे रहा है। तुम्हारे पास तो फिर भी कोसने को बीएसपी और पुलिस प्रशासन था, अधिकांश के पास तो सिवा अपनी किस्मत के, कोसने को और कुछ नहीं होता। ऐसे लोगों की सहानुभूति तुम्हारे साथ है। पर उसकी सहानुभूति उस माँ की ममता जैसी है जिसकी छाती में दूध नहीं। लोग दंभ के साथ कहते हैं कि उनके समाज में बेटियों की शादी में लाखों रुपए का लेनदेन होता है। मैं पूछता था, जिनके यहां इतने पैसे नहीं हैं, वे क्या करते हैं? आज मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल गया है। वे या तो बेटियों को गर्भ में मार देते हैं या फिर जवान होने पर जहर दे देते हैं। अगर उनके हाथ कांपते हैं तो बेटियां खुद ही जहर खा लेती हैं। वे मरना नहीं चाहतीं। वे किसी न किसी तरह अपने जीवन की गाड़ी खींचना चाहती हैं, खींचती रहती हैं पर समाज उसे जीने नहीं देता। बार-बार उसकी शादी का जिक्र छेड़ता है। मदद तो नहीं करता पर ताने दे देकर उसे छलनी कर देता है। घर के पुरुष सदस्यों से कहता है, ‘कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा, हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से तो नहीं चलेगा।’ पर वह रास्ता नहीं दिखाते। गरीब का हाथ नहीं थामते। शायद वह उनकी मजबूरियों का फायदा उठाना चाहते हैं। यदि समाज में गरीब और असहाय लोग न हों तो माँ बहन की गालियां कौन सुनेगा? यदि गरीब लड़कियां न होंगी तो उनकी ऐय्याशियों का क्या होगा? देश में हजारों कानून हैं, उनकी जद में कौन आएगा? बंगलों में झाड़ू-कटका, पोंछा बर्तन कौन करेगा? पर हर कोई ऐसा नहीं कर पाता। किसी किसी के लिए आत्मसम्मान जीवन से बड़ा होता है। ऐसे लोगों के लिए इस सड़े-गले समाज में कोई जगह नहीं। गरीब का आत्मसम्मान इस समाज के लिए टॉफी के रैपर जैसा है जिसकी जगह कूड़ेदान में होती है। गरीब तो उसके काम का है, पर उसका आत्मसम्मान नहीं। इसलिए हम पूछते हैं सुनील! तुम क्यों न मरे... समाज को तसल्ली मिल जाती। वह दो दिन के लिए ही सही पूरे दम से उन्हें कोसता तो सही, जिन्होंने तुमसे जीने का हक छीन लिया।
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