Monday, April 18, 2011
माँ अब सद्बुद्धि दे
माँ! तुझे शत्-शत् प्रणाम। तूने जीवन दिया, बुद्धि दी, प्रकृति में जीवन धारण, आमोद प्रमोद, संतति सृजन की शक्ति, धन धान्य, आश्रय सभी कुछ दिया बस सद्बुद्धि नहीं दी। आज सबसे बड़ी जरूरत सद्बुद्धि की है माँ! आज तेरा हर बच्चा भूखा है। वह अपना टिफिन खाने के बाद, क्लास के कमजोर बच्चों का टिफिन झपट रहा है। एक के बाद एक, वह सभी का टिफिन खा जाना चाहता है। अपने हिस्से की जमीन पर वह मकान बनवाता है और दूसरे के हिस्से की जमीन पर पार्क बनवाना चाहता है। अपने हिस्से के पानी से वह कार धोता है और दूसरे के हिस्से का पानी पीने, नहाने-धोने के लिए छीन लेता है। अपनी बेटी का दुख उससे देखा नहीं जाता पर दूसरे की बेटी पर मिट्टी तेल उंडेलकर आग लगा देता है। उसे अपनी लकीर बड़ी करना नहीं आता, वह दूसरों की लकीरों को छोटा करने के लिए डस्टर हाथ में लिए घूम रहा है। जहां वह रहता, कमाता-खाता है, वहां इतनी गंदगी फैला चुका है कि शुद्ध हवा और थोड़ी ठंडक की चाह में उसे पहाड़ों और बीहड़ों में ताक झांक करनी पड़ती है। विद्या का वह बादशाह है। वह जमीन से लेकर अंतरिक्ष तक, दिमाग से लेकर गर्भ तक में ताकाझांकी करने में सिद्धहस्त हो चुका है किन्तु ये जानकारियां उसके किसी काम नहीं आ रहीं। वैसे हत्या तो कंस ने भी नवजातों की की थी। पर इसकी वजह उसका वह डर था जो आकाशवाणी के चलते उसके मन में घर कर गया था। उसे बताया गया था कि उसका भांजा ही उसकी मौत का कारण बनेगा। पर यहां तो कहानी ही उलट है। कोई शगुन के नाम पर तो कोई दहेज से छुटकारा पाने कन्या भ्रूणों की हत्या कर रहा है। और जब इनके बेटों के लिए लड़कियां नहीं मिल रहीं तब ये लड़कियों की तस्करी करवा रहे हैं, अपहरण करवा रहे हैं और उनसे ब्याह रचाकर वंश चलाने की कोशिश कर रहे हैं। वह अजन्मी कन्याओं का हत्यारा है, वह किशोरियों और युवतियों का अपहरणकर्ता है। कहते हैं वह तुम्हारा सबसे बड़ा उपासक है माँ। जब यही हाथ नवरात्रि पर कन्याओं को भोजन परोसते होंगे, तो पता नहीं माँ तुम्हें कैसा लगता होगा। उसके पास विद्या तो बहुत है माँ पर बुद्धि नहीं है। बुद्धि विहीन विद्या के चलते वह अपने ही विनाश का सामान कर रहा है माँ। कोई बम बना रहा है, कोई मिसाइल बना रहा है तो कोई प्रकृति को ही नष्ट करने पर तुला है। उर्वरकों के बेधड़क इस्तेमाल से धरती बांझ हो रही है। भूजल दोहन से धरती की छाती सूख गई है। वातानुकूलन यंत्रों की जहरीली गैस से सांसों में जहर घुल रही है। जंगल की कब्र पर शहर खड़े हैं। पेड़ों की अस्थियों से बंगले सजे हैं। ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसि’ में अब आम आदमी नारकीय यातनाएं भोग रहा है। पाकेट मारने वाले की तो सार्वजनिक रूप से पिटाई हो रही है। चोरों को पुलिस पट्टे लगा रही है। डकैतों को गोलियों से भूना जा रहा है। पर जमीन के पेट में पाइप डालकर दूसरों के हिस्से का पानी चुराने वालों के खिलाफ तो कोई कानून नहीं। अपने घर को ठंडा करने के लिए लगाए गए ‘एसी’ से वातावरण गर्म हो रहा है, इसकी भी किसी को परवाह नहीं। दरअसल दोष तो तेरा है माँ। 365 दिन के साल में तेरे पास केवल दो ही नवरात्र हैं, इस धरती की तरफ पलट कर देखने के लिए। कम से कम भक्त तो ऐसा ही कहते हैं। वैसे वे सही ही कहते होंगे। इस नर्क में रहने की किसे इच्छा होती होगी? पर अब जब तू आ ही गई है मां, तो इंसान को सद्बुद्धि दे। उसे बता कि तूने अपना सबकुछ उसके लिए धरती को सजाने पर खर्च कर दिया था। अब तेरे पास कुछ भी नहीं है। होता भी, तो तू उसे उनपर नहीं लुटाती जिन्होंने इस धरती की, तेरी सृष्टि की तौहीन की है।
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