Monday, April 18, 2011

80 परसेंट कमीशन

क्या आपने कभी ऐसा धंधा देखा है जिसमें 80 परसेन्ट कमीशन दिया या लिया जाता हो। 80 फीसदी कमाई का जिक्र अलबत्ता होता रहा है। मोटी कमाई का नाम लेते ही जेहन में शराब और जमीन का धंधा उभरने लगता है। पर इन धंधों को कोई अच्छी नजर से नहीं देखता। एक बेहद पाक साफ पेशा है चिकित्सक का। देखते ही सम्मान करने को जी चाहता है। जब रोगी ठीक होकर जाता है तो डाक्टर ही नहीं, नर्स और वार्डबॉय के प्रति भी कृतज्ञ होकर जाता है। पर इस पेशे को चंद डाक्टर मिलकर कलंकित कर रहे हैं। उन्हें इस पेशे में सेवा कम मेवा अधिक दिखाई देने लगा है। सेवा की शपथ लेकर इस पेशे में आए चिकित्सक आते ही लाखों रुपए कमा लेना चाहते हैं। वे सरकार या कंपनी किसी की नौकरी नहीं करना चाहते। वहां बंधे बंधाए वेतन में प्रतिदिन 30-40 मरीज देखने होते हैं। जबकि निजी क्लिनिक खोलने पर 10 मरीज देखकर भी उससे अधिक कमाया जा सकता है। एक मरीज को देखने की फीस 150 से 200 रुपए। 500-700 की दवा जिसमें 40 से 60 फीसदी कमीशन तय है। इसके अलावा दो-तीन हजार के टेस्ट जिसमें 40 से 80 फीसदी तक कमीशन सेट है। सुनने पर एकाएक यकीन नहीं होता है पर जब इस पेशे से जुड़े लोग इसकी जानकारी देते हैं तो मानना ही पड़ता है। दिक्कत यह है दवा कंपनी का पूरा कारोबार ही डाक्टरों के भरोसे है, इसलिए वे चाह कर भी उनसे बाहर नहीं जा सकते। इसी तरह डायग्नोस्टिक का धंधा भी सौ फीसदी डाक्टरों के भरोसे है जिनसे वे बाहर नहीं जा सकते। पूरे बाजार में टेस्ट के रेट एक समान हैं पर प्रत्येक की कमाई अलग अलग है। जिन लोगों का अपना कोई वजूद या विश्वसनीयता है वे डाक्टरों को कम कमीशन देते हैं और ज्यादा कमाते हैं। इसके उलट जिनका धंधा नया नया है और जिनका अभी बाजार में कोई नाम नहीं हो पाया है वे डाक्टरों को मोटा कमीशन देते हैं। कुछ ऐसा ही हाल नर्सिंग होम्स और अस्पतालों का है। यहां स्थाई तौर पर कोई चिकित्सक नहीं होता। डाक्टर यहां कमीशन और फीस प्राप्त करने के लिए अनुबंधित हैं। वे यहां नौकरी नहीं करते। उनका काम है मरीज देखो और अपनी फीस ले जाओ। मरीज को भर्ती करो तो कमीशन प्राप्त करो। आईसीयू में डालो तो और भी अधिक कमीशन ले लो। आपरेशन करो तो उसके पैसे ले लो। अब आते हैं इसके दूसरे पहलू पर। फीस की कमाई जहां एक नम्बर की है वहीं कमीशन की कमाई दो नम्बर की है। इस रकम का कोई हिसाब किताब नहीं है। कुछ दवा कंपनियां सीधे अस्पताल के डायरेक्टर या संचालक को गिफ्ट में कार, फ्लैट, फार्म हाउस तक देती हैं। कोई डायग्नोस्कि उपकरण गिफ्ट कर देता है। ऐसा नहीं है कि सरकार को इस गोरखधंधे का पता नहीं है। कालाधन इस देश में वैसे भी कभी टेंशन नहीं रहा। चूंकि प्रतिवर्ष नए डाक्टरों की एक पूरी फौज आती है इसलिए एक संतुलन बना हुआ है। नया डाक्टर दो चार साल सरकारी या किसी कंपनी अस्पताल में नौकरी कर लेता और नाम कमाने के बाद निकलकर अपनी दुकान खोल लेता है। परेशान हाल गरीब आदमी जब सस्ती चिकित्सा के विकल्प ढूंढता है तो संगठन के जरिए उनका विरोध करता है। लगातार महंगे होते जा रहे इलाज के चलते ही गरीब से लेकर मध्यमवर्गीय परिवार तक दवा दुकान में फार्मासिस्ट को रोग बताकर सीधे दवा ले लेता है। रोगी खुश कि उसे कन्सल्टेंसी फीस नहीं देनी पड़ी और दवा विक्रेता भी खुश की इस बिक्री में उसे किसी को कमीशन नहीं देनी।

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