Monday, April 18, 2011
जीत गए हम
हां! जीत गए हम। बीती रात हर तरफ खुशी थी, लोग पागलों की तरह चीख चिल्ला रहे थे। आधी रात को सड़कों पर बारात सा शोर शराबा था। लोग फोन पर फोन, एसएमएस पर एसएमएस किए जा रहे थे। मिठाइयां बंट रही थी। पेट से पेट टकराकर गले मिला जा रहा था। चारों तरफ खुशी, उल्लास और उत्साह का माहौल था। पेड़ पौधे नाच रहे थे, हवा गुनगुना रही थी। गाड़ियां फर्राटे भर रही थीं, कई-कई हजार वाट के कार स्टीरियो फुल वाल्यूम में बज रहे थे। लोग जीती हुई शर्तें-बाजियां माफ कर रहे थे। सबका दिल एकाएक काफी बड़ा हो गया था। कहीं ढोल बज रहा था तो कहीं नगाड़े बज रहे थे। पूरा परिवार इकट्ठा होकर नाच गा रहा था। हां, हम जीत गए थे। ऐसी खुशी बहुत कम देखने को मिलती है। यह खुशी कारगिल की खुशी से बड़ी थी। मुम्बई आतंकी हमलों का मुकाबला करने वालों से इन शूरवीरों का कद हजार गुना बड़ा है। पप्पू पास होता है तो पाव या आधा किलो मिठाई लेकर मंदिर हो जाता है। पर इस जीत में शैम्पेन की बोतलें खुलती हैं। शादी ब्याह में भी ऐसी सर्वव्यापी खुशी देखने को नहीं मिलती। निस्संदेह वहां कई लोग खुश होते हैं किन्तु कुछ चेहरों पर तनाव और कुछ पर थकान दिखाई देती है। पर यहां तो केवल खुशी ही खुशी थी। पूरा देश एक हो गया था। अमीरी गरीबी, धर्म मजहब सभी खाइयां पट चुकी थीं। काश हमारा देश हमेशा इसी तरह एकजुट रह पाता। काश भारतीय होने का उनका यह गर्व चंद घंटों का न होता। काश उन्हें पता होता कि क्वालिटी के नाम पर जिन विदेशी वस्तुओं के वे कायल हो रहे हैं उनका उनके जीवन से कोई खास लेना देना नहीं है। इन चीजों के बिना भी उनका काम चल सकता है। पर उनके हाथ में आया पैसा इन विदेशी जिन्सों पर खर्च हो जाता है। ऐसा होने से गांव-गांव में, कस्बों-शहरों में छोटे छोटे उत्पाद बनाने वालों के घर के चूल्हे बुझ जाते हैं। उनके बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है। कागज की चरखी बनाने वाले अब हसरत भरी निगाहों से चीनी खिलौनों को बिकता देखते हैं। पथराई आंखों से बुनकर विदेशी फटी हुई जीन्स को हजारोें रुपयों में बिकता देखता है और आहें भरकर रह जाता है। फूटा चना, भुना मटर, मुर्रा, लाई-बताशा, नींबू की शिकंजी बनाने वालों के पेट पिचके हुए हैं। जिनके हाथ में पैसा है वे पेप्सी, थम्स अप पी रहे हैं। पिज्जा बर्गर खा रहे हैं। जिस देश के लोगों को अपने देशवासियों से, उनके उत्पादों से प्यार न हो, उनका देश प्रेम भी एक छलावा है। क्रिकेट की दीवानगी उनके लिए स्टेटस सिम्बॉल मात्र है। यह खेल उन्हें केवल इसलिए प्रभावित करता है कि कभी उनपर राज करने वाले का यह राष्ट्रीय खेल था। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है जिसे समझ पाना हर किसी के बस का नहीं। वैसे भी कैसा वर्ल्डकप। जिस खेल को आधी दुनिया खेलती ही नहीं, उसका विश्वकप कैसा। अमरीका, चीन, जर्मनी, जापान, रूस कोई भी तो क्रिकेट नहीं खेलता। चंद देशों के बीच होने वाले इस खेल को यदि इतना महत्व मिला है तो उसकी एकमात्र वजह प्रचार अभियान है। स्वतंत्रता या गणतंत्र दिवस पर ध्वाजारोहण से कतराने वाले लोग क्रिकेट के नाम पर एकाएक झंडा लेकर नाचने गाने लगते हैं। राष्ट्रीय पर्वों पर आज भी 1970 के दशक के गीत बज रहे हैं पर आईपीएल और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के प्रत्येक ईवेंट के लिए नए नए गीत लिखे जा रहे हैं। रंगा जमा दे.., धो दे..., चक दे..., दे घुमाके... जैसे गीतों से हौसला अफजाही की जा रही है। स्मरण नहीं आता जवानों की हौसला अफजाई के लिए पिछला गीत कब लिखा गया था... बहरहाल बधाई हो। इंडिया जीत गया है। हम बौड़म नहीं कहलाना चाहते.. इसलिए कहते हैं... बधाई हो।
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