Monday, April 18, 2011

नवाबी मार रही

कभी-कभी संदेह होता है कि देश में लोकतंत्र है। यदि मान भी लें कि लोकतंत्र है तो यह मानने में भी कोई संकोच नहीं कि यह अलहदा किस्म का लोकतंत्र है। यहां लोक का उपयोग किया जाता है। कभी अपने मनोरंजन के लिए, कभी अपनी आन-बान और शान झाड़ने के लिए तो अकसर निचोड़ने के लिए। भिलाई नगर निगम भी इसका कोई अपवाद नहीं है। शुक्रवार को बजट ले देकर पारित हो गया। इससे पहले पक्ष और विपक्ष के सदस्यों ने राजस्व बढ़ाने के लिए तरह तरह के सुझाव दिये। पर हाय! किसी ने भी खर्च कम करने का कोई सुझाव नहीं दिया। इसलिए जनता को राहत की कोई गुंजाइश ही नहीं बनी। पेट्रोल डीजल के दाम अंतरराष्ट्रीय तेल पूल बढ़ा रहा है। कुछ जिन्सों के दाम केन्द्र सरकार तो कुछ जिन्सों के दाम राज्य सरकार बढ़ा रही है। नगर निगम ने भी ऐन ऐसा ही किया तो क्या गलत किया। दरअसल ये चुने गए नवाब हैं इसलिए इन्हें नवाबी शौक है तो गलत क्या है? नवाबों ने एक से एक इमारतें बनवार्इं, गेट बनवाए, बुर्ज बनवाए और इतिहास में अमर हो गए। अब भी लोग इतिहास में दर्ज हो जाना चाहते हैं। इसलिए उनकी नजर ऐसे कार्यों पर होती है जिसमें एक अदद नाम पट्टिका जरूर लग सके। नवाब भी जनता को कोड़े मारकर पैसे निकालते थे और लोकतांत्रिक सरकारें भी ऐन ऐसा ही कर रही हैं। बजट चर्चा में निजी कालोनियों की भी बातें उठीं। इसका लाजिक समझ में नहीं आया। इंसानों की बीएमआई की तर्ज पर कालोनियों में रिक्त भूखण्डों की शर्त है। इसका हकीकत से कोई वास्ता नहीं है। मान लेते हैं कि एक एकड़ भूमि पर 10 मकान अर्थात 10 परिवार हैं। 10 परिवारों में अधिकतम 20-25 बच्चे होंगे। भूखण्ड की 15 फीसदी जगह इनके लिए पर्याप्त होती रही होगी। किन्तु अब फ्लैट बन रहे हैं। उतनी ही जगह में 10 की बजाय 20, 30 या 40 फ्लैट बन रहे हैं। इसी अनुपात में बच्चों की संख्या भी बढ़ रही है। पर रिक्त छोड़ी गई भूमि उतनी ही है। इसपर बहस कैसी। यह भूमि तो इतने परिवारों की पार्किंग स्पेस को भी कम पड़ेगी। पर इसे कोई समझने को तैयार नहीं है। वे तो नियमों के कीड़े हैं। बैठकों में कागज लहराने के आदी हैं। नियम, उपनियम, धारा, उपधारा, कंडिकाओं के भूल भुलैय्या में फंसकर ये न्याय और उचित अनुचित का ज्ञान भुला बैठे लोग हैं। आज निगम क्षेत्र का आम आदमी परेशान है कि लाखों का प्लाट खरीदकर मकान बनवाने के बाद भी उसकी दुश्वारियां कम नहीं हुई हैं। उसके केवल कर्त्तव्य हैं, कोई अधिकार नहीं। वह संपत्तिकर, विकास शुल्क, पानी शुल्क, बिजली शुल्क सबकुछ देने के लिए बाध्य है किन्तु इनमें से किसी पर भी उसका अधिकार नहीं है। बिजली वाले की जब मर्जी होगी बिजली देगा या नहीं देगा, पानी वाला भी मर्जी का मालिक होगा, निगम विकास कार्य नहीं करेगा पर ये सभी आपसे शुल्क जरूर वसूलेंगे। ऐसी दादागिरी पहले नवाबों के जमाने में होती थी और अब लोकतंत्र के नाम पर हो रही हैं। दरअसल इन सभी बीमारियों की जड़ जनप्रतिरोध के अभाव में छिपी हैं। महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता इसीलिए माना जाता है कि उन्होंने जन प्रतिरोध खड़ा किया था। अंग्रेज महात्मा गांधी से नहीं बल्कि उनके वैचारिक आंदोलन से डरते थे। एक वक्त था जब पश्चिम बंगाल मेें तीव्र जनप्रतिरोध होता था। बस के किराए में पांच पैसे का इजाफा करने के लिए भूमिका बांधनी होती थी। कलकत्ता देश का सबसे सस्ता शहर था। जब शेष भारत में अठन्नी नहीं चलती थी, वहां स्टीमर का किराया छह पैसा था। पर अब सब खत्म हो गया।

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