Monday, April 18, 2011
बदलेगा कोर्ट का तकियाकलाम
अदालतों में ‘माईलार्ड’ या ‘मिलार्ड’ का प्रयोग बतौर तकियाकलाम ही होता आया है। इस शब्द का उपयोग करते समय मन में किसी तरह की हीन भावना आती रही हो, ऐसा नहीं लगता। माईलार्ड कहने मात्र से कोई किसी का लार्ड नहीं हो जाता। बहरहाल, तर्क यह है कि यह अंग्रेजों के जमाने की परिपाटी है मगर इससे बाहर आने के लिए भी हमने ब्रिटेन की पहल का ही इंतजार किया। ब्रिटेन समेत कई देशों की अदालतों ने कई साल पहले माईलार्ड के तकियाकलाम को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। अब वे सर कहते हैं। ‘सर’ शब्द भी अंग्रेजी संबोधन ही है। यूरोप में सम्मानपूर्वक किसी को संबोधित करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। हमारे यहां ड्राइवर सवारी को, बेयरा ग्राहक को, स्टूडेन्ट टीचर को, सेल्समैन ग्राहक को सर कहता है। अंग्रेजों के जमाने में जो भारतीय काला साहब बन जाता था, उसे अंग्रेज ‘सर’ की उपाधि भी दिया करते थे। कहने का मतलब यह कि ‘माईलार्ड’ कहना छोड़ने के बाद भी हम ब्रिटिश मानसिकता से नहीं उबर पाएंगे। अंग्रेजों ने जज को माईलार्ड कहना बंद कर दिया तो हमने भी कर दिया। अंग्रेज जज को सर कहेगा इसलिए हम भी कहेंगे। महाशय, महोदय जैसे शब्द डाउनमार्केट और लोअर क्लास हैं। इससे शायद व्यक्ति के पढ़े-लिखे होने का परिचय नहीं मिलता। बिलासपुर हाईकोर्ट के अधिवक्ताओं ने हाल ही में फैसला किया है कि अब वे कोर्ट में जज को माईलार्ड नहीं कहेंगे। ऐसा करने वाला छत्तीसगढ़ देश में तीसरा राज्य बन गया है। इसके साथ ही कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जहां भारतीय वकील पहल कर सकते हैं। इन्हीं में से एक है काला कोट। ब्रिटेन या यूरोप में ठंड ज्यादा पड़ती है। गर्मियों में भी वहां का तापमान बहुत ज्यादा नहीं होता। लिहाजा वहां सूट, कोट-टाई या गाउन एक आरामदेह परिधान है। इससे उलट भारत एक ऊष्ण देश है। यहां सर्दियों के एकाध महीने को छोड़ दें तो साल भर यहां का तापमान आपको कोट-टाई की इजाजत नहीं देता। वैसे भी न्याय के साथ कोट का कोई संबंध नहीं है। अधिवक्ता चाहें तो इसके खिलाफ भी फैसला कर सकते हैं। वे अपने लिए कोई ऐसा परिधान चुनें जो उन्हें अलग भी दिखाता हो, गणवेष जैसा हो पर इतना कम्फर्टेबल हो कि सुबह 10 से शाम छह बजे तक उसे पहने रहने में कोई दिक्कत न महसूस हो। आज जैसे हालात देश भर की अदालतों के हैं, अधिकांश स्थानों पर बहुसंख्य वकीलों के लिए बैठने तक की जगह नहीं है। दिन भर खड़े-खड़े उनके पांव में ‘वेरीकोस वेन’ की शिकायत हो जाती है। बिना कमरा, बिना पंखे का वकील कोट पहनने की झखमारी क्यों करे? इसके अलावा अदालती भाषा में भी खासा सुधार की गुंजायश है। सीधी सपाट भाषा में केस डायरियां बनाने की दिशा में पहल हो तो न केवल कागज की खपत कम हो, बल्कि वक्त बचे। जिन पेड़ों को काटकर कागज बनाया जाता है, वे पेड़ भी बचें। जजों को भी फाइल पढ़ने में सुविधा हो। वक्त कम लगे और केसों का निपटारा जल्द हो। एक और पहल यह हो सकती है कि स्टैम्प के बजाय फ्रैंकिंग मशीनों का उपयोग हो जो आवेदनों पर स्टैम्प शुल्क की मोहर लगा दे। इससे उचित मूल्य के स्टैम्प पेपर के अभाव में कई कई स्टैम्प पेपर में चार लाइन लिखने से बचा जा सकता है। आवेदन एक पन्ने का हो और शुल्क 500 रुपए तो एक सीट पर आवेदन किया जाए और उसपर 500 रुपए का स्टैम्प फ्रैंकिंग मशीन से लगवा लिया जाए। वक्त बचेगा, भटकन बचेगी, छपाई का खर्च बचेगा। यदि कुछ सकारात्मक पहल हों तो पूरा देश उसका स्वागत करेगा।
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