Monday, April 18, 2011

बिना राम का रामराज

चारों तरफ रामराज का शोर है। पर राम हैं कहां? राम ने मर्यादा की खातिर राजसी ठाठ छोड़कर वन गमन किया। शबरी के जूठे बेर खाए, पर्णकुटीर में निवास किया। धोबी तक की सुनवाई की। खुद आंसू के घूंट पीते रहे और गर्भवती सीता को वन भेज दिया। विवाह के बाद से कष्ट झेल रही सीता अंत में धरती में समा गई। शायद वे सिस्टम से टकराकर थक गई थीं। क्या यह आत्महत्या थी? क्या यह भी पलायन था? सीता इसलिए धरती में समाने का हौसला जुटा सकीं कि उनके दोनों पुत्र अब सुरक्षित हाथों में थे। उनके भविष्य को लेकर उन्हें अब कोई चिंता नहीं थी। वनवास के दौरान पति साथ में थे। उन्होंने हर कष्ट सहा। रावण की लंका में उन्होंने तिनके की ओट लेकर अपनी अस्मिता को बचाए रखा। गर्भावस्था के दौरान लाख कष्ट झेलकर भी उन्होंने लव-कुश को जन्म दिया और उनका पालन पोषण कर उन्हें सक्षम और समर्थ बनाया। वे प्रत्येक झंझावात को झेल गर्इं पर इसके बाद उन्होंने मुक्ति का मार्ग चुन लिया। पर अंग्रेजी सोच का मारा आधुनिक हिन्दुस्तान दो-मने की स्थिति में है। यहां आत्महत्या करना या खुदकुशी की कोशिश करना दोनों जुर्म है। हमारी मानसिकता इतनी गंदी हो चुकी है कि अब लोगों की मजबूरी हमें उसका अपराध लगने लगी है। और इस अपराध की सजा हम उसके परिवार को निस्संकोच दे सकते हैं। 1994 में संयंत्र कर्मी एमएल शाह की मौत हो गई। उसे आत्महत्या करार देकर बीएसपी ने उसके परिवार के सारे अधिकार छीन लिये। कोई नहीं पूछता कि 17 साल तक परिवार उसी क्वार्टर में रहता रहा तो बीएसपी ने कोई कार्यवाही क्यों नहीं की। परिवार ने अपने मकान के साथ एक शेड बनवा लिया था। संयंत्र के अनेक आवासों में इससे कहीं बड़े अवैध निर्माण हुए हैं। क्या उन सबको मकान खाली करने का नोटिस दे दिया गया है? क्या उन सबके पीछे नगर सेवा ने अपने गुण्डे लगवा दिए हैं। अभी ज्यादा पुरानी बात नहीं है, बीएसपी में नौकरी करने वाले एक दंपति का सामान उठाकर क्वार्टर से बाहर फेंक दिया गया। वजह केवल इतनी थी कि पति या पत्नी दोनों में से कोई भी उस ग्रेड के मकान में रहने के लिए इन्टाइटल्ड नहीं था, जिसमें वे रह रहे थे। दंपति ने आवेदन दे रखा था किन्तु कोई सुनवाई नहीं हुई। फिर एक दिन अचानक इन्फोर्समेन्ट के गुण्डे वहां पहुंच गए और उन्होंने संयंत्र कर्मी का सामान बाहर फेंकवा दिया। हम किसी भी संस्था में व्यवस्था की जरूरतों से नावाकिफ नहीं हैं किन्तु जब दोहरा मापदंड देखते हैं तो हाजमोला लेने के बाद भी बात हजम नहीं होती। सेक्टर-8 में एक विशाल क्वार्टर किसी बाबाजी को गिफ्ट में दिया गया है। अक्षय पात्र फाउंडेशन को बीएसपी की डेयरी दे दी गई है। नर्सिंग कालेज का संचालन भी किसी निजी संस्था को दे दिया गया है। संयंत्र के कई स्कूल भवन खाली पड़े हैं। किसी दिन पता लगेगा कि कोई एक्स डीजीएम, किसी एक्स सीनियर मैनेजर या इनके किसी एनजीओ को ये भवन लीज पर दे दिए गए हैं। वे वहां बिंदास धंधा कर रहे हैं ठीक उसी तरह जिस तरह समाज के नाम पर लिए गए भवनों में जमकर व्यवसाय चल रहा है। कहीं साल दर साल सेल लगा हुआ है तो कहीं किराया भंडारों का पूल बनाकर भाड़े के मंगल भवन का धंधा फलफूल रहा है। बीएसपी का गराज खाली पड़ा है। किसी दिन उसे भी गुपचुप ठेके पर चढ़ा दिया जाएगा? किसमें दम है जो विरोध करे। पुलिस, पत्रकार, प्रशासन पर बीएसपी के दर्जनों अहसान हैं।

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