Tuesday, May 31, 2011

ये सफेदपोश नक्सली

राज्य शासन ने नक्सलियों की मदद करने का आरोप लगाकर जिस विनायक सेन और पीयूष गुहा के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा चलाकर आजीवन कारावास दिलवा दी थी वे सुप्रीम कोर्ट से जमानत पर छूट गए हैं। पर इधर नक्सलियों के लिए जमीन तैयार करने वाले उन सरकारी दामादों को वह प्रश्रय दे रही है। एक तरफ जहां पुलिस के महकमे में नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनाती को सजा के तौर पर पेश किया जाता है वहीं कुछ विभाग है जिसके अधिकारी यहां से नहीं जाने के लिए बाकायदा लाबिंग करते हैं। एक ऐसा ही मामला कल पेश आया है। वर्षों से यहां जमे जगदलपुर के तहसीलदार थथाई का कई बार यहां से ट्रांसफर हुआ किन्तु वह बार बार यहां लौट आने में कामयाब हुआ। दरअसल वह कभी यहां से गया ही नहीं। जब भी कभी ट्रांसफर हुआ उसने प्रभार सौंपने से इंकार किया और लाबिंग में जुट गया। चंद दिनों में ही वह अपना ट्रांसफर कैंसल करवाने में कामयाब हो गया। इस थथाई को एसीबी ने हाल ही में बंदोबस्त के नाम पर हजारों रुपए की रिश्वत खाते रंगे हाथों गिरफ्तार किया है। यह मामला शीशे की तरह साफ है कि बस्तर समेत सभी आदिवासी इलाके पिछले पांच दशकों से वसूली के अड्डे बने हुए हैं। व्यापारियों से लेकर सरकारी अफसर तक यहां मलाई छानते रहे हैं। नए मामले से यह भी जाहिर हो गया है कि अवसरवादियों का मलाई छानना अभी बंद नहीं हुआ है। कथित नक्सलियों के बारे में भी अकसर यह कहा जाता है कि वे यहां वसूली में अपना हिस्सा मांगने के लिए इकट्ठा हुए हैं। यहां अपनी जगह बनाने के लिए उन्होंने वनवासियों के हक की लड़ाई शुरू की तथा उन्हें परेशान करने वाले वन विभाग के अधिकारियों, पुलिस और वनोपज दलालों को धमकाना चमकाना शुरू किया। यह वह दौर था जब मारकाट बहुत कम हुआ करती थी। वनवासी अपने इन हथियारबंद दादाओं के साथ जुड़कर सरकारी शोषकों के खिलाफ आवाज उठाते थे। कालांतर में पुलिस ने सख्ती शुरू की और फिर मारकाट का अंतहीन सिलसिला शुरू हो गया। अब सवाल यह उठता है कि कथित नक्सली सिर्फ कोटवारों और पुलिस वालों को ही निशाना क्यों बना रहे हैं। शेष शासकीय अमला और शोषक व्यापारी वर्ग क्यों सुरक्षित है। दरअसल इनसे उन्हें अपना हिस्सा मिलता है जबकि पुलिस उनकी आजादी और जान के पीछे पड़ी है। इनपर हमला वे अपने अस्तित्व की रक्षा ेके लिए करते हैं। जाहिर है बस्तर की लड़ाई में करे कोई और भरे कोई की कहावत चरितार्थ हो रही है। शासकीय मशीनरी वसूली कर रही है, मामाओं को हिस्सा पहुंचा रही है। पुलिस भी अपनी नौकरी कर रही है। उसे नक्सली पकड़ने के लिए कहा गया है तो वह नक्सली पकड़ रही है। मारने के लिए कहा गया तो मार रही है। आत्मसमर्पण कराने को कहा गया तो आत्मसमर्पण करा रही है। बहरहाल यहां हमारा उद्देश्य पुलिस, गृह मंत्रालय या सरकार की मंशा पर नक्सलियों को लेकर सवालिया निशान लगाना नहीं है। हम तो केवल यह पूछना चाहते हैं कि विनायक सेन और पीयूष गुहा यदि नक्सलियों के प्रति सहानूभूति रखने, वनवासियों के शोषण के मामले में उनसे सहमति रखने के कारण देशद्रोही करार दिये जा सकते हैं तो नक्सलियों के लिए जमीन तैयार करने वाले सरकारी अधिकारियों पर कौन से आरोप लगाए जाने चाहिए?

Monday, April 18, 2011

डॉ बिनायक सेन

बहुत साल पहले की बात है। मोहल्ले का ही एक शराबी अपनी पत्नी को बेतहाशा पीट रहा था। लहूलुहान होने के बावजूद उसकी पत्नी अपने मुंह से एक आवाज नहीं निकाल रही थी। प्रत्येक लात और घूंसे पर उसके मुंह से एक घुटी घुटी सी चीख निकलने को होती और फिर वहीं घुट कर रह जाती। इससे उसके जिंदा होने का अहसास मात्र होता था। हमसे रहा न गया तो हमने उसके पति को रोकने की कोशिश की। जवाब मिला, ‘जाकर अपना काम करो। मेरे घर में दखलअंदाजी करने का तुम्हें कोई हक नहीं। मैं अपनी बीवी को पीट रहा हूँ। तुम्हें क्या? इसके यार लगते हो?’ बात बढ़े इससे पहले ही हम वहां से परे हट गए। पर मन ही मन सोचा कि काश यही सवाल पुलिस ने किया होता। हमने किसी तरह पुलिस तक यह बात पहुंचा दी। कुछ-कुछ ऐसा ही मामला छत्तीसगढ़ में नक्सली उन्मूलन का है। भयभीत पड़ोसियों की जुबान पर ताला है। उन्हें डर है कि विरोध या बीच बचाव करने पर स्वयं उन्हीं पर लांछन लगाया जा सकता है। डॉ बिनायक सेन के मामले में यह उदाहरण एकदम फिट बैठता है। यहां आक्रांता शराबी नहीं पर मदहोश है। चुनावी सफलताओं ने उसके मनोबल को खतरनाक होने की हद तक बढ़ा दिया है। आंकड़ों से मिली शाबासी ने उसे आत्ममुग्ध कर दिया है। उसे लगता है कि उसका हर फैसला दुरुस्त है और किसी को भी उसमें दखलअंदाजी करने का हक नहीं है। दंतेवाड़ा में गांधीवादी समाज सेवी हिमांशु कुमार ने वनवासियों का साथ दिया तो उनका आश्रम उजाड़ दिया गया। दल्लीराजहरा क्षेत्र में पिछले कई दशकों से आदिवासियों, माइंस श्रमिकों एवं पिछड़े गरीबों के बीच काम कर रहे बिनायक सेन से नक्सलियों ने सम्पर्क किया तो उसने बिनायक सेन को ही उठवा लिया। ज्ञात अज्ञात तरीकों से उसे ही देशद्रोही करार दे दिया। देर से ही सही पर सर्वोच्च न्यायालय के रूप में पुलिस आई। उसने बिना किसी पूर्वाग्रह के मामले को देखा और दूध का दूध पानी का पानी कर दिया। यहां एक बात हमेशा स्मरण रखने की है। लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च है। उसकी सोच, उसकी समझ और उसका विवेक स्वतंत्र है। हमें उनकी चिंताओं को दूर करना होगा। उनकी सोच में सकारात्मक परिवर्तन लाना होगा। उनका मुंह बंद करके हम लोकतंत्र को मजबूत नहीं कर सकते। आज मामला घर के अंदर का है। घर वाले ही विरोध में मुंह खोल रहे हैं जिनके साथ मिल बैठकर चर्चा की जा सकती है। यदि हमने उन्हें बोलने नहीं दिया, बहस से डरते रहे तो कल को बात खुलेगी और दूर तक जाएगी। फिर किस किस का मुंह बंद करते फिरेंगे? आज शासन और प्रशासन के भय और राज्य की मर्यादा के चलते लोग संयम के साथ अपनी बात रख रहे हैं। कल को जब बाहर के लोग नरसंहार और जनसंहार जैसे शब्दों का उपयोग करने लगेंगे तब यही चमचमाता चेहरा छिपाने को जगह नहीं मिलेगी। सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप सही समय पर आया है किन्तु वह किसी तरह की जांच का आदेश देने के लिए मजबूर हो जाए इससे पहले ही हमें अपना घर संभालना होगा। सरकार को भी समझना होगा कि सुरक्षा और शांति के लिए जनता कहीं अधिक फिक्रमंद है क्योंकि उसके आसपास कोई सुरक्षा घेरा नहीं है। उसकी चिंताए स्वाभाविक और सत्य हैं। जनता ही प्रदेश है, प्रदेश ही जनता है।

बदलेगा कोर्ट का तकियाकलाम

अदालतों में ‘माईलार्ड’ या ‘मिलार्ड’ का प्रयोग बतौर तकियाकलाम ही होता आया है। इस शब्द का उपयोग करते समय मन में किसी तरह की हीन भावना आती रही हो, ऐसा नहीं लगता। माईलार्ड कहने मात्र से कोई किसी का लार्ड नहीं हो जाता। बहरहाल, तर्क यह है कि यह अंग्रेजों के जमाने की परिपाटी है मगर इससे बाहर आने के लिए भी हमने ब्रिटेन की पहल का ही इंतजार किया। ब्रिटेन समेत कई देशों की अदालतों ने कई साल पहले माईलार्ड के तकियाकलाम को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। अब वे सर कहते हैं। ‘सर’ शब्द भी अंग्रेजी संबोधन ही है। यूरोप में सम्मानपूर्वक किसी को संबोधित करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। हमारे यहां ड्राइवर सवारी को, बेयरा ग्राहक को, स्टूडेन्ट टीचर को, सेल्समैन ग्राहक को सर कहता है। अंग्रेजों के जमाने में जो भारतीय काला साहब बन जाता था, उसे अंग्रेज ‘सर’ की उपाधि भी दिया करते थे। कहने का मतलब यह कि ‘माईलार्ड’ कहना छोड़ने के बाद भी हम ब्रिटिश मानसिकता से नहीं उबर पाएंगे। अंग्रेजों ने जज को माईलार्ड कहना बंद कर दिया तो हमने भी कर दिया। अंग्रेज जज को सर कहेगा इसलिए हम भी कहेंगे। महाशय, महोदय जैसे शब्द डाउनमार्केट और लोअर क्लास हैं। इससे शायद व्यक्ति के पढ़े-लिखे होने का परिचय नहीं मिलता। बिलासपुर हाईकोर्ट के अधिवक्ताओं ने हाल ही में फैसला किया है कि अब वे कोर्ट में जज को माईलार्ड नहीं कहेंगे। ऐसा करने वाला छत्तीसगढ़ देश में तीसरा राज्य बन गया है। इसके साथ ही कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जहां भारतीय वकील पहल कर सकते हैं। इन्हीं में से एक है काला कोट। ब्रिटेन या यूरोप में ठंड ज्यादा पड़ती है। गर्मियों में भी वहां का तापमान बहुत ज्यादा नहीं होता। लिहाजा वहां सूट, कोट-टाई या गाउन एक आरामदेह परिधान है। इससे उलट भारत एक ऊष्ण देश है। यहां सर्दियों के एकाध महीने को छोड़ दें तो साल भर यहां का तापमान आपको कोट-टाई की इजाजत नहीं देता। वैसे भी न्याय के साथ कोट का कोई संबंध नहीं है। अधिवक्ता चाहें तो इसके खिलाफ भी फैसला कर सकते हैं। वे अपने लिए कोई ऐसा परिधान चुनें जो उन्हें अलग भी दिखाता हो, गणवेष जैसा हो पर इतना कम्फर्टेबल हो कि सुबह 10 से शाम छह बजे तक उसे पहने रहने में कोई दिक्कत न महसूस हो। आज जैसे हालात देश भर की अदालतों के हैं, अधिकांश स्थानों पर बहुसंख्य वकीलों के लिए बैठने तक की जगह नहीं है। दिन भर खड़े-खड़े उनके पांव में ‘वेरीकोस वेन’ की शिकायत हो जाती है। बिना कमरा, बिना पंखे का वकील कोट पहनने की झखमारी क्यों करे? इसके अलावा अदालती भाषा में भी खासा सुधार की गुंजायश है। सीधी सपाट भाषा में केस डायरियां बनाने की दिशा में पहल हो तो न केवल कागज की खपत कम हो, बल्कि वक्त बचे। जिन पेड़ों को काटकर कागज बनाया जाता है, वे पेड़ भी बचें। जजों को भी फाइल पढ़ने में सुविधा हो। वक्त कम लगे और केसों का निपटारा जल्द हो। एक और पहल यह हो सकती है कि स्टैम्प के बजाय फ्रैंकिंग मशीनों का उपयोग हो जो आवेदनों पर स्टैम्प शुल्क की मोहर लगा दे। इससे उचित मूल्य के स्टैम्प पेपर के अभाव में कई कई स्टैम्प पेपर में चार लाइन लिखने से बचा जा सकता है। आवेदन एक पन्ने का हो और शुल्क 500 रुपए तो एक सीट पर आवेदन किया जाए और उसपर 500 रुपए का स्टैम्प फ्रैंकिंग मशीन से लगवा लिया जाए। वक्त बचेगा, भटकन बचेगी, छपाई का खर्च बचेगा। यदि कुछ सकारात्मक पहल हों तो पूरा देश उसका स्वागत करेगा।

तुम क्यों नहीं मरे सुनील

जिस दिन से तुमने आंदोलन शुरू किया था, लोग यही कह रहे थे कि तुम नौटंकी कर रहे हो। ऐसी गीदड़ भभकियां देने वालों को वे खूब पहचानते हैं। वे कहते थे, ‘कुछ नहीं होने वाला’। पर जब सुबह-सुबह खबर आई कि तुम सबने जहर खा लिया है तो पूरे शहर को गहरा सदमा पहुंचा। लोगों को अपने कानों पर यकीन नहीं आ रहा था। एकाएक उनके आक्रोश की दिशा बदल गई थी। वह बीएसपी को, पुलिस प्रशासन को कोसने लगे थे। उन्हें यकीन हो चला था कि तुम नौटंकी नहीं कर रहे थे, तुम्हारी बातों में दम था। पर थोड़ी ही देर में यह भी खबर आ गई कि तुमने जहर नहीं खाया है। और जनभावना पहले से कहीं अधिक मुखर होकर फिर तुम्हें कोसने लगी। लोगों का गुस्सा लौट कर तुम्हारी तरफ आ गया। अब वे पहले से कहीं अधिक जोश के साथ तुम्हें कोस रहे थे। कोई इसे सोची समझी साजिश बता रहा था तो कोई जवान बहनों और माँ के बोझ से मुक्ति पाने का नया तरीका। कुछ ही दीवाने हैं जिन्हें आज भी ऐसा लगता है कि तुम्हारे पिता ही नहीं बल्कि तुम्हारे पूरे परिवार की हत्या की गई है। ऐसा मानने वालों में वे परिवार शामिल हैं जिनके मुखिया या तो बीमार हैं या मर चुके हैं। इन परिवारों में बेटियां घासफूस की तरह बढ़ रही हैं, बेटे बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। इनके यहां अर्थ अभाव के चलते बेटियां अधेड़Þ हो चुकी हैं। समाज को उनसे सहानुभूति तो है किन्तु ऐसे परिवार नहीं हैं जो बिना दहेज के उन्हें बहू बनाने को तैयार हों। समाज उन्हें स्लो पॉयजन दे रहा है। तुम्हारे पास तो फिर भी कोसने को बीएसपी और पुलिस प्रशासन था, अधिकांश के पास तो सिवा अपनी किस्मत के, कोसने को और कुछ नहीं होता। ऐसे लोगों की सहानुभूति तुम्हारे साथ है। पर उसकी सहानुभूति उस माँ की ममता जैसी है जिसकी छाती में दूध नहीं। लोग दंभ के साथ कहते हैं कि उनके समाज में बेटियों की शादी में लाखों रुपए का लेनदेन होता है। मैं पूछता था, जिनके यहां इतने पैसे नहीं हैं, वे क्या करते हैं? आज मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल गया है। वे या तो बेटियों को गर्भ में मार देते हैं या फिर जवान होने पर जहर दे देते हैं। अगर उनके हाथ कांपते हैं तो बेटियां खुद ही जहर खा लेती हैं। वे मरना नहीं चाहतीं। वे किसी न किसी तरह अपने जीवन की गाड़ी खींचना चाहती हैं, खींचती रहती हैं पर समाज उसे जीने नहीं देता। बार-बार उसकी शादी का जिक्र छेड़ता है। मदद तो नहीं करता पर ताने दे देकर उसे छलनी कर देता है। घर के पुरुष सदस्यों से कहता है, ‘कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा, हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से तो नहीं चलेगा।’ पर वह रास्ता नहीं दिखाते। गरीब का हाथ नहीं थामते। शायद वह उनकी मजबूरियों का फायदा उठाना चाहते हैं। यदि समाज में गरीब और असहाय लोग न हों तो माँ बहन की गालियां कौन सुनेगा? यदि गरीब लड़कियां न होंगी तो उनकी ऐय्याशियों का क्या होगा? देश में हजारों कानून हैं, उनकी जद में कौन आएगा? बंगलों में झाड़ू-कटका, पोंछा बर्तन कौन करेगा? पर हर कोई ऐसा नहीं कर पाता। किसी किसी के लिए आत्मसम्मान जीवन से बड़ा होता है। ऐसे लोगों के लिए इस सड़े-गले समाज में कोई जगह नहीं। गरीब का आत्मसम्मान इस समाज के लिए टॉफी के रैपर जैसा है जिसकी जगह कूड़ेदान में होती है। गरीब तो उसके काम का है, पर उसका आत्मसम्मान नहीं। इसलिए हम पूछते हैं सुनील! तुम क्यों न मरे... समाज को तसल्ली मिल जाती। वह दो दिन के लिए ही सही पूरे दम से उन्हें कोसता तो सही, जिन्होंने तुमसे जीने का हक छीन लिया।

बिना राम का रामराज

चारों तरफ रामराज का शोर है। पर राम हैं कहां? राम ने मर्यादा की खातिर राजसी ठाठ छोड़कर वन गमन किया। शबरी के जूठे बेर खाए, पर्णकुटीर में निवास किया। धोबी तक की सुनवाई की। खुद आंसू के घूंट पीते रहे और गर्भवती सीता को वन भेज दिया। विवाह के बाद से कष्ट झेल रही सीता अंत में धरती में समा गई। शायद वे सिस्टम से टकराकर थक गई थीं। क्या यह आत्महत्या थी? क्या यह भी पलायन था? सीता इसलिए धरती में समाने का हौसला जुटा सकीं कि उनके दोनों पुत्र अब सुरक्षित हाथों में थे। उनके भविष्य को लेकर उन्हें अब कोई चिंता नहीं थी। वनवास के दौरान पति साथ में थे। उन्होंने हर कष्ट सहा। रावण की लंका में उन्होंने तिनके की ओट लेकर अपनी अस्मिता को बचाए रखा। गर्भावस्था के दौरान लाख कष्ट झेलकर भी उन्होंने लव-कुश को जन्म दिया और उनका पालन पोषण कर उन्हें सक्षम और समर्थ बनाया। वे प्रत्येक झंझावात को झेल गर्इं पर इसके बाद उन्होंने मुक्ति का मार्ग चुन लिया। पर अंग्रेजी सोच का मारा आधुनिक हिन्दुस्तान दो-मने की स्थिति में है। यहां आत्महत्या करना या खुदकुशी की कोशिश करना दोनों जुर्म है। हमारी मानसिकता इतनी गंदी हो चुकी है कि अब लोगों की मजबूरी हमें उसका अपराध लगने लगी है। और इस अपराध की सजा हम उसके परिवार को निस्संकोच दे सकते हैं। 1994 में संयंत्र कर्मी एमएल शाह की मौत हो गई। उसे आत्महत्या करार देकर बीएसपी ने उसके परिवार के सारे अधिकार छीन लिये। कोई नहीं पूछता कि 17 साल तक परिवार उसी क्वार्टर में रहता रहा तो बीएसपी ने कोई कार्यवाही क्यों नहीं की। परिवार ने अपने मकान के साथ एक शेड बनवा लिया था। संयंत्र के अनेक आवासों में इससे कहीं बड़े अवैध निर्माण हुए हैं। क्या उन सबको मकान खाली करने का नोटिस दे दिया गया है? क्या उन सबके पीछे नगर सेवा ने अपने गुण्डे लगवा दिए हैं। अभी ज्यादा पुरानी बात नहीं है, बीएसपी में नौकरी करने वाले एक दंपति का सामान उठाकर क्वार्टर से बाहर फेंक दिया गया। वजह केवल इतनी थी कि पति या पत्नी दोनों में से कोई भी उस ग्रेड के मकान में रहने के लिए इन्टाइटल्ड नहीं था, जिसमें वे रह रहे थे। दंपति ने आवेदन दे रखा था किन्तु कोई सुनवाई नहीं हुई। फिर एक दिन अचानक इन्फोर्समेन्ट के गुण्डे वहां पहुंच गए और उन्होंने संयंत्र कर्मी का सामान बाहर फेंकवा दिया। हम किसी भी संस्था में व्यवस्था की जरूरतों से नावाकिफ नहीं हैं किन्तु जब दोहरा मापदंड देखते हैं तो हाजमोला लेने के बाद भी बात हजम नहीं होती। सेक्टर-8 में एक विशाल क्वार्टर किसी बाबाजी को गिफ्ट में दिया गया है। अक्षय पात्र फाउंडेशन को बीएसपी की डेयरी दे दी गई है। नर्सिंग कालेज का संचालन भी किसी निजी संस्था को दे दिया गया है। संयंत्र के कई स्कूल भवन खाली पड़े हैं। किसी दिन पता लगेगा कि कोई एक्स डीजीएम, किसी एक्स सीनियर मैनेजर या इनके किसी एनजीओ को ये भवन लीज पर दे दिए गए हैं। वे वहां बिंदास धंधा कर रहे हैं ठीक उसी तरह जिस तरह समाज के नाम पर लिए गए भवनों में जमकर व्यवसाय चल रहा है। कहीं साल दर साल सेल लगा हुआ है तो कहीं किराया भंडारों का पूल बनाकर भाड़े के मंगल भवन का धंधा फलफूल रहा है। बीएसपी का गराज खाली पड़ा है। किसी दिन उसे भी गुपचुप ठेके पर चढ़ा दिया जाएगा? किसमें दम है जो विरोध करे। पुलिस, पत्रकार, प्रशासन पर बीएसपी के दर्जनों अहसान हैं।

एक मच्छर आदमी को...

‘एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है..’ यह एक फिल्मी डायलॉग हो सकता है किन्तु इसका एक और पहलू भी है। मच्छर लाखों लोगों को रोजी रोटी का साधन भी उपलब्ध कराता है। यह एक बड़ा व्यवसाय है जिसमें काफी पैसा है। एक समय था गरीब आदमी सिर तक को चादर से ढांप कर सोता था। माताएं बच्चे को अंडी की साड़ी में लपेट कर सुलाती थीं। फिर आई मच्छरदानी। पहले बनी कपड़े की और फिर नाइलोन की मच्छरदानियां भी आ गर्इं। मच्छरों से बचने का यह संभवत: सर्वाधिक निरापद और प्रभावशाली तरीका है। पर सभी बंधनों को तोड़कर भाग रहे इंसान की फितरत को यह मंजूर नहीं था। इसलिए उसने मच्छरों को मारने के लिए जहर ईजाद की और उसका शिकार मच्छरों के साथ साथ खुद भी होता चला गया। मच्छरों ने तो कुछ ही समय में अपना अनुकूलन कर लिया और फिर जहर पीकर वह पहले से कहीं ज्यादा मोटा तगड़ा और आक्रामक हो गया। अलबत्ता इंसानों को दुनिया भर की बीमारियों ने घेर लिया। इसी सब से उपजा मच्छरों पर आधारित व्यवसाय। अब प्रतिदिन मच्छरों से लड़Þने का एक नया हथियार बाजार में आ रहा है। साइथियान, मेलाथियान, साइक्लोथ्रिन जैसी जहर बुझी अगरबत्तियां, छिड़काव की दवाएं और वेपराइजर बाजार में हैं। प्रतिवर्ष इनमें एक्स्ट्रा पावर जोड़ा जा रहा है। मच्छर छाप अगरबत्तियों को स्मोक लेस किया जा रहा है। उन्नयन के साथ साथ इसकी कीमतों में भी उछाल आ रहा है और आज मच्छारों के खिलाफ हमारे अभियान का खर्च घरेलू बजट से लेकर नगर निगम, राज्य शासन यहां तक कि केन्द्र सरकार के बजट में भी दिखने लगा है। यह एक ऐसा युद्ध है जिसमें हमारी शायद ही कभी जीत होगी। जनसंख्या का घनत्व बढ़ने के साथ-साथ साफ सफाई एक बड़ी समस्या बनकर उभरी हैं। खुली नालियां, जहां-तहां जमा पानी, जितने घर उतने ही सेप्टिक टैंक ने मच्छरों के ब्रीडिंग सेन्टर्स में कई गुना इजाफा कर दिया है। तालाबों के लिए गम्बूजिया मछलियों की भी चर्चा होती रही जो मच्छरों का लार्वा खाने के लिए प्रसिद्ध हैं। पर वह भी मच्छरों को निर्मूल नहीं कर सकती थीं। मच्छर वाटरप्रूफ सेप्टिक टैंकों में पनपते रहे और शाम होते ही गैस पाइप से निकलकर बाहर आते रहे। मच्छर निर्मूलन या युद्ध हार चुकने के बाद अब हम डिफेन्सिव हो गए हैं। घरों में दो-दो पल्ले लगने लगे हैं - एक लकड़ी पल्ला तो दूसरा जाली पल्ला। खिड़कियों में जाली लग गई है। बिजली के साकेट में आल-आउट गुडनाइट फंसे हैं पर नाइट है कि गुड हो ही नहीं रही। लिहाजा शरीर पर मलहम पोतकर सो रहे हैं। पलंग के नीचे स्मोकलेस कायल जल रहा है। विज्ञान ने मलेरिया का निदान तो बहुत साल पहले ढूंढ लिया था किन्तु अब फैल्सिपेरम मलेरिया ने उसके वजूद को हिला कर रख दिया है जिसमें अकसर डाक्टर को कुछ करने का मौका ही नहीं मिलता। मच्छरों के खिलाफ लड़ाई हम तेजी से हार रहे हैं फिर भी ड्रेनेज, बेकार बहकर जमा हुआ पानी हमारी नजरों को आकर्षित नहीं कर रहा। हम इतने लीचड़ हो गए हैं कि शायद भगवान को भी अब हमसे घृणा हो गई है। विज्ञान ने जिन्दगी तो लंबी कर दी है किन्तु उसका अधिकांश हिस्सा आज जीने लायक नहीं रहा।

80 परसेंट कमीशन

क्या आपने कभी ऐसा धंधा देखा है जिसमें 80 परसेन्ट कमीशन दिया या लिया जाता हो। 80 फीसदी कमाई का जिक्र अलबत्ता होता रहा है। मोटी कमाई का नाम लेते ही जेहन में शराब और जमीन का धंधा उभरने लगता है। पर इन धंधों को कोई अच्छी नजर से नहीं देखता। एक बेहद पाक साफ पेशा है चिकित्सक का। देखते ही सम्मान करने को जी चाहता है। जब रोगी ठीक होकर जाता है तो डाक्टर ही नहीं, नर्स और वार्डबॉय के प्रति भी कृतज्ञ होकर जाता है। पर इस पेशे को चंद डाक्टर मिलकर कलंकित कर रहे हैं। उन्हें इस पेशे में सेवा कम मेवा अधिक दिखाई देने लगा है। सेवा की शपथ लेकर इस पेशे में आए चिकित्सक आते ही लाखों रुपए कमा लेना चाहते हैं। वे सरकार या कंपनी किसी की नौकरी नहीं करना चाहते। वहां बंधे बंधाए वेतन में प्रतिदिन 30-40 मरीज देखने होते हैं। जबकि निजी क्लिनिक खोलने पर 10 मरीज देखकर भी उससे अधिक कमाया जा सकता है। एक मरीज को देखने की फीस 150 से 200 रुपए। 500-700 की दवा जिसमें 40 से 60 फीसदी कमीशन तय है। इसके अलावा दो-तीन हजार के टेस्ट जिसमें 40 से 80 फीसदी तक कमीशन सेट है। सुनने पर एकाएक यकीन नहीं होता है पर जब इस पेशे से जुड़े लोग इसकी जानकारी देते हैं तो मानना ही पड़ता है। दिक्कत यह है दवा कंपनी का पूरा कारोबार ही डाक्टरों के भरोसे है, इसलिए वे चाह कर भी उनसे बाहर नहीं जा सकते। इसी तरह डायग्नोस्टिक का धंधा भी सौ फीसदी डाक्टरों के भरोसे है जिनसे वे बाहर नहीं जा सकते। पूरे बाजार में टेस्ट के रेट एक समान हैं पर प्रत्येक की कमाई अलग अलग है। जिन लोगों का अपना कोई वजूद या विश्वसनीयता है वे डाक्टरों को कम कमीशन देते हैं और ज्यादा कमाते हैं। इसके उलट जिनका धंधा नया नया है और जिनका अभी बाजार में कोई नाम नहीं हो पाया है वे डाक्टरों को मोटा कमीशन देते हैं। कुछ ऐसा ही हाल नर्सिंग होम्स और अस्पतालों का है। यहां स्थाई तौर पर कोई चिकित्सक नहीं होता। डाक्टर यहां कमीशन और फीस प्राप्त करने के लिए अनुबंधित हैं। वे यहां नौकरी नहीं करते। उनका काम है मरीज देखो और अपनी फीस ले जाओ। मरीज को भर्ती करो तो कमीशन प्राप्त करो। आईसीयू में डालो तो और भी अधिक कमीशन ले लो। आपरेशन करो तो उसके पैसे ले लो। अब आते हैं इसके दूसरे पहलू पर। फीस की कमाई जहां एक नम्बर की है वहीं कमीशन की कमाई दो नम्बर की है। इस रकम का कोई हिसाब किताब नहीं है। कुछ दवा कंपनियां सीधे अस्पताल के डायरेक्टर या संचालक को गिफ्ट में कार, फ्लैट, फार्म हाउस तक देती हैं। कोई डायग्नोस्कि उपकरण गिफ्ट कर देता है। ऐसा नहीं है कि सरकार को इस गोरखधंधे का पता नहीं है। कालाधन इस देश में वैसे भी कभी टेंशन नहीं रहा। चूंकि प्रतिवर्ष नए डाक्टरों की एक पूरी फौज आती है इसलिए एक संतुलन बना हुआ है। नया डाक्टर दो चार साल सरकारी या किसी कंपनी अस्पताल में नौकरी कर लेता और नाम कमाने के बाद निकलकर अपनी दुकान खोल लेता है। परेशान हाल गरीब आदमी जब सस्ती चिकित्सा के विकल्प ढूंढता है तो संगठन के जरिए उनका विरोध करता है। लगातार महंगे होते जा रहे इलाज के चलते ही गरीब से लेकर मध्यमवर्गीय परिवार तक दवा दुकान में फार्मासिस्ट को रोग बताकर सीधे दवा ले लेता है। रोगी खुश कि उसे कन्सल्टेंसी फीस नहीं देनी पड़ी और दवा विक्रेता भी खुश की इस बिक्री में उसे किसी को कमीशन नहीं देनी।

माँ अब सद्बुद्धि दे

माँ! तुझे शत्-शत् प्रणाम। तूने जीवन दिया, बुद्धि दी, प्रकृति में जीवन धारण, आमोद प्रमोद, संतति सृजन की शक्ति, धन धान्य, आश्रय सभी कुछ दिया बस सद्बुद्धि नहीं दी। आज सबसे बड़ी जरूरत सद्बुद्धि की है माँ! आज तेरा हर बच्चा भूखा है। वह अपना टिफिन खाने के बाद, क्लास के कमजोर बच्चों का टिफिन झपट रहा है। एक के बाद एक, वह सभी का टिफिन खा जाना चाहता है। अपने हिस्से की जमीन पर वह मकान बनवाता है और दूसरे के हिस्से की जमीन पर पार्क बनवाना चाहता है। अपने हिस्से के पानी से वह कार धोता है और दूसरे के हिस्से का पानी पीने, नहाने-धोने के लिए छीन लेता है। अपनी बेटी का दुख उससे देखा नहीं जाता पर दूसरे की बेटी पर मिट्टी तेल उंडेलकर आग लगा देता है। उसे अपनी लकीर बड़ी करना नहीं आता, वह दूसरों की लकीरों को छोटा करने के लिए डस्टर हाथ में लिए घूम रहा है। जहां वह रहता, कमाता-खाता है, वहां इतनी गंदगी फैला चुका है कि शुद्ध हवा और थोड़ी ठंडक की चाह में उसे पहाड़ों और बीहड़ों में ताक झांक करनी पड़ती है। विद्या का वह बादशाह है। वह जमीन से लेकर अंतरिक्ष तक, दिमाग से लेकर गर्भ तक में ताकाझांकी करने में सिद्धहस्त हो चुका है किन्तु ये जानकारियां उसके किसी काम नहीं आ रहीं। वैसे हत्या तो कंस ने भी नवजातों की की थी। पर इसकी वजह उसका वह डर था जो आकाशवाणी के चलते उसके मन में घर कर गया था। उसे बताया गया था कि उसका भांजा ही उसकी मौत का कारण बनेगा। पर यहां तो कहानी ही उलट है। कोई शगुन के नाम पर तो कोई दहेज से छुटकारा पाने कन्या भ्रूणों की हत्या कर रहा है। और जब इनके बेटों के लिए लड़कियां नहीं मिल रहीं तब ये लड़कियों की तस्करी करवा रहे हैं, अपहरण करवा रहे हैं और उनसे ब्याह रचाकर वंश चलाने की कोशिश कर रहे हैं। वह अजन्मी कन्याओं का हत्यारा है, वह किशोरियों और युवतियों का अपहरणकर्ता है। कहते हैं वह तुम्हारा सबसे बड़ा उपासक है माँ। जब यही हाथ नवरात्रि पर कन्याओं को भोजन परोसते होंगे, तो पता नहीं माँ तुम्हें कैसा लगता होगा। उसके पास विद्या तो बहुत है माँ पर बुद्धि नहीं है। बुद्धि विहीन विद्या के चलते वह अपने ही विनाश का सामान कर रहा है माँ। कोई बम बना रहा है, कोई मिसाइल बना रहा है तो कोई प्रकृति को ही नष्ट करने पर तुला है। उर्वरकों के बेधड़क इस्तेमाल से धरती बांझ हो रही है। भूजल दोहन से धरती की छाती सूख गई है। वातानुकूलन यंत्रों की जहरीली गैस से सांसों में जहर घुल रही है। जंगल की कब्र पर शहर खड़े हैं। पेड़ों की अस्थियों से बंगले सजे हैं। ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसि’ में अब आम आदमी नारकीय यातनाएं भोग रहा है। पाकेट मारने वाले की तो सार्वजनिक रूप से पिटाई हो रही है। चोरों को पुलिस पट्टे लगा रही है। डकैतों को गोलियों से भूना जा रहा है। पर जमीन के पेट में पाइप डालकर दूसरों के हिस्से का पानी चुराने वालों के खिलाफ तो कोई कानून नहीं। अपने घर को ठंडा करने के लिए लगाए गए ‘एसी’ से वातावरण गर्म हो रहा है, इसकी भी किसी को परवाह नहीं। दरअसल दोष तो तेरा है माँ। 365 दिन के साल में तेरे पास केवल दो ही नवरात्र हैं, इस धरती की तरफ पलट कर देखने के लिए। कम से कम भक्त तो ऐसा ही कहते हैं। वैसे वे सही ही कहते होंगे। इस नर्क में रहने की किसे इच्छा होती होगी? पर अब जब तू आ ही गई है मां, तो इंसान को सद्बुद्धि दे। उसे बता कि तूने अपना सबकुछ उसके लिए धरती को सजाने पर खर्च कर दिया था। अब तेरे पास कुछ भी नहीं है। होता भी, तो तू उसे उनपर नहीं लुटाती जिन्होंने इस धरती की, तेरी सृष्टि की तौहीन की है।

जीत गए हम

हां! जीत गए हम। बीती रात हर तरफ खुशी थी, लोग पागलों की तरह चीख चिल्ला रहे थे। आधी रात को सड़कों पर बारात सा शोर शराबा था। लोग फोन पर फोन, एसएमएस पर एसएमएस किए जा रहे थे। मिठाइयां बंट रही थी। पेट से पेट टकराकर गले मिला जा रहा था। चारों तरफ खुशी, उल्लास और उत्साह का माहौल था। पेड़ पौधे नाच रहे थे, हवा गुनगुना रही थी। गाड़ियां फर्राटे भर रही थीं, कई-कई हजार वाट के कार स्टीरियो फुल वाल्यूम में बज रहे थे। लोग जीती हुई शर्तें-बाजियां माफ कर रहे थे। सबका दिल एकाएक काफी बड़ा हो गया था। कहीं ढोल बज रहा था तो कहीं नगाड़े बज रहे थे। पूरा परिवार इकट्ठा होकर नाच गा रहा था। हां, हम जीत गए थे। ऐसी खुशी बहुत कम देखने को मिलती है। यह खुशी कारगिल की खुशी से बड़ी थी। मुम्बई आतंकी हमलों का मुकाबला करने वालों से इन शूरवीरों का कद हजार गुना बड़ा है। पप्पू पास होता है तो पाव या आधा किलो मिठाई लेकर मंदिर हो जाता है। पर इस जीत में शैम्पेन की बोतलें खुलती हैं। शादी ब्याह में भी ऐसी सर्वव्यापी खुशी देखने को नहीं मिलती। निस्संदेह वहां कई लोग खुश होते हैं किन्तु कुछ चेहरों पर तनाव और कुछ पर थकान दिखाई देती है। पर यहां तो केवल खुशी ही खुशी थी। पूरा देश एक हो गया था। अमीरी गरीबी, धर्म मजहब सभी खाइयां पट चुकी थीं। काश हमारा देश हमेशा इसी तरह एकजुट रह पाता। काश भारतीय होने का उनका यह गर्व चंद घंटों का न होता। काश उन्हें पता होता कि क्वालिटी के नाम पर जिन विदेशी वस्तुओं के वे कायल हो रहे हैं उनका उनके जीवन से कोई खास लेना देना नहीं है। इन चीजों के बिना भी उनका काम चल सकता है। पर उनके हाथ में आया पैसा इन विदेशी जिन्सों पर खर्च हो जाता है। ऐसा होने से गांव-गांव में, कस्बों-शहरों में छोटे छोटे उत्पाद बनाने वालों के घर के चूल्हे बुझ जाते हैं। उनके बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है। कागज की चरखी बनाने वाले अब हसरत भरी निगाहों से चीनी खिलौनों को बिकता देखते हैं। पथराई आंखों से बुनकर विदेशी फटी हुई जीन्स को हजारोें रुपयों में बिकता देखता है और आहें भरकर रह जाता है। फूटा चना, भुना मटर, मुर्रा, लाई-बताशा, नींबू की शिकंजी बनाने वालों के पेट पिचके हुए हैं। जिनके हाथ में पैसा है वे पेप्सी, थम्स अप पी रहे हैं। पिज्जा बर्गर खा रहे हैं। जिस देश के लोगों को अपने देशवासियों से, उनके उत्पादों से प्यार न हो, उनका देश प्रेम भी एक छलावा है। क्रिकेट की दीवानगी उनके लिए स्टेटस सिम्बॉल मात्र है। यह खेल उन्हें केवल इसलिए प्रभावित करता है कि कभी उनपर राज करने वाले का यह राष्ट्रीय खेल था। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है जिसे समझ पाना हर किसी के बस का नहीं। वैसे भी कैसा वर्ल्डकप। जिस खेल को आधी दुनिया खेलती ही नहीं, उसका विश्वकप कैसा। अमरीका, चीन, जर्मनी, जापान, रूस कोई भी तो क्रिकेट नहीं खेलता। चंद देशों के बीच होने वाले इस खेल को यदि इतना महत्व मिला है तो उसकी एकमात्र वजह प्रचार अभियान है। स्वतंत्रता या गणतंत्र दिवस पर ध्वाजारोहण से कतराने वाले लोग क्रिकेट के नाम पर एकाएक झंडा लेकर नाचने गाने लगते हैं। राष्ट्रीय पर्वों पर आज भी 1970 के दशक के गीत बज रहे हैं पर आईपीएल और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के प्रत्येक ईवेंट के लिए नए नए गीत लिखे जा रहे हैं। रंगा जमा दे.., धो दे..., चक दे..., दे घुमाके... जैसे गीतों से हौसला अफजाही की जा रही है। स्मरण नहीं आता जवानों की हौसला अफजाई के लिए पिछला गीत कब लिखा गया था... बहरहाल बधाई हो। इंडिया जीत गया है। हम बौड़म नहीं कहलाना चाहते.. इसलिए कहते हैं... बधाई हो।

नवाबी मार रही

कभी-कभी संदेह होता है कि देश में लोकतंत्र है। यदि मान भी लें कि लोकतंत्र है तो यह मानने में भी कोई संकोच नहीं कि यह अलहदा किस्म का लोकतंत्र है। यहां लोक का उपयोग किया जाता है। कभी अपने मनोरंजन के लिए, कभी अपनी आन-बान और शान झाड़ने के लिए तो अकसर निचोड़ने के लिए। भिलाई नगर निगम भी इसका कोई अपवाद नहीं है। शुक्रवार को बजट ले देकर पारित हो गया। इससे पहले पक्ष और विपक्ष के सदस्यों ने राजस्व बढ़ाने के लिए तरह तरह के सुझाव दिये। पर हाय! किसी ने भी खर्च कम करने का कोई सुझाव नहीं दिया। इसलिए जनता को राहत की कोई गुंजाइश ही नहीं बनी। पेट्रोल डीजल के दाम अंतरराष्ट्रीय तेल पूल बढ़ा रहा है। कुछ जिन्सों के दाम केन्द्र सरकार तो कुछ जिन्सों के दाम राज्य सरकार बढ़ा रही है। नगर निगम ने भी ऐन ऐसा ही किया तो क्या गलत किया। दरअसल ये चुने गए नवाब हैं इसलिए इन्हें नवाबी शौक है तो गलत क्या है? नवाबों ने एक से एक इमारतें बनवार्इं, गेट बनवाए, बुर्ज बनवाए और इतिहास में अमर हो गए। अब भी लोग इतिहास में दर्ज हो जाना चाहते हैं। इसलिए उनकी नजर ऐसे कार्यों पर होती है जिसमें एक अदद नाम पट्टिका जरूर लग सके। नवाब भी जनता को कोड़े मारकर पैसे निकालते थे और लोकतांत्रिक सरकारें भी ऐन ऐसा ही कर रही हैं। बजट चर्चा में निजी कालोनियों की भी बातें उठीं। इसका लाजिक समझ में नहीं आया। इंसानों की बीएमआई की तर्ज पर कालोनियों में रिक्त भूखण्डों की शर्त है। इसका हकीकत से कोई वास्ता नहीं है। मान लेते हैं कि एक एकड़ भूमि पर 10 मकान अर्थात 10 परिवार हैं। 10 परिवारों में अधिकतम 20-25 बच्चे होंगे। भूखण्ड की 15 फीसदी जगह इनके लिए पर्याप्त होती रही होगी। किन्तु अब फ्लैट बन रहे हैं। उतनी ही जगह में 10 की बजाय 20, 30 या 40 फ्लैट बन रहे हैं। इसी अनुपात में बच्चों की संख्या भी बढ़ रही है। पर रिक्त छोड़ी गई भूमि उतनी ही है। इसपर बहस कैसी। यह भूमि तो इतने परिवारों की पार्किंग स्पेस को भी कम पड़ेगी। पर इसे कोई समझने को तैयार नहीं है। वे तो नियमों के कीड़े हैं। बैठकों में कागज लहराने के आदी हैं। नियम, उपनियम, धारा, उपधारा, कंडिकाओं के भूल भुलैय्या में फंसकर ये न्याय और उचित अनुचित का ज्ञान भुला बैठे लोग हैं। आज निगम क्षेत्र का आम आदमी परेशान है कि लाखों का प्लाट खरीदकर मकान बनवाने के बाद भी उसकी दुश्वारियां कम नहीं हुई हैं। उसके केवल कर्त्तव्य हैं, कोई अधिकार नहीं। वह संपत्तिकर, विकास शुल्क, पानी शुल्क, बिजली शुल्क सबकुछ देने के लिए बाध्य है किन्तु इनमें से किसी पर भी उसका अधिकार नहीं है। बिजली वाले की जब मर्जी होगी बिजली देगा या नहीं देगा, पानी वाला भी मर्जी का मालिक होगा, निगम विकास कार्य नहीं करेगा पर ये सभी आपसे शुल्क जरूर वसूलेंगे। ऐसी दादागिरी पहले नवाबों के जमाने में होती थी और अब लोकतंत्र के नाम पर हो रही हैं। दरअसल इन सभी बीमारियों की जड़ जनप्रतिरोध के अभाव में छिपी हैं। महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता इसीलिए माना जाता है कि उन्होंने जन प्रतिरोध खड़ा किया था। अंग्रेज महात्मा गांधी से नहीं बल्कि उनके वैचारिक आंदोलन से डरते थे। एक वक्त था जब पश्चिम बंगाल मेें तीव्र जनप्रतिरोध होता था। बस के किराए में पांच पैसे का इजाफा करने के लिए भूमिका बांधनी होती थी। कलकत्ता देश का सबसे सस्ता शहर था। जब शेष भारत में अठन्नी नहीं चलती थी, वहां स्टीमर का किराया छह पैसा था। पर अब सब खत्म हो गया।

बैग में लाश

लड़के और लड़कियों में चाहे हम जितनी समानताएं ढूंढें, प्राकृतिक तौर पर दोनों का स्वभाव इतना जुदा है कि उसे पाट पाना लगभग असंभव है। नए जमाने का खुलापन, सुप्रीम कोर्ट की शह और समाज के उकसावे में आकर लड़कियों ने जो राह अपने लिए चुनी है वह खुद उनके लिए कभी भी कब्र खोद सकती है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता का मानना है कि स्त्रियों को समझना बेहद मुश्किल होता है और पुरुषों के लिए तो उन्हें समझ पाना लगभग असंभव होता है। लड़के आसानी से लड़कियों की फ्लर्टिंग के शिकार हो जाते हैं। कुछ लड़के तो इतने बेवकूफ होते हैं कि लड़की ने उन्हें बर्थ-डे विश कर दिया तो उनके मन में लड्डू फूटने लगता है। कभी हाथ पकड़ लिया, एक धौल जमा दिया या गाल पर चिकोटी काट ली तो वह उसे प्यार समझ बैठता है। फिर जब एक दिन वह प्रणय निवेदन करता है तो बड़ी सहजता से कह देती है कि उसने उसे कभी इस नजर से नहीं देखा। यहीं आकर लड़का कन्फ्यूज हो जाता है। भावनाओं को हैण्डल करने में लड़के अकसर अनाड़ी साबित होते हैं। ठुकराए जाने पर या तो वे डिप्रेशन में चले जाते हैं या फिर आक्रामक हो जाते हैं. दिल्ली में हाल ही में बैग में मिली लाश के पीछे भी कमोबेश यही कहानी नजर आती है। लड़की खुलेपन की इतनी कायल थी कि वह एक युवक के साथ लिव इन रिलेशन में थी। यही नहीं वह कई अन्यों के साथ फ्लर्ट भी करती थी। हो सकता है, उसे यह स्वाभाविक लगता हो और युवावस्था की डिमांड लगती हो किन्तु यह भी उतना ही स्वाभाविक है कि कोई उसके प्यार में वाकई अंधा हो गया हो। प्यार में ठुकराए जाने पर या धोखा खाने पर युवकों में बहुत कम प्रतिशत ऐसे लोगों का होता है जो कविता या गजल लिखने बैठ जाते हैं। कुछ और भूखा रहकर, शराब पीकर या सिगरेट पीकर खुद को प्रताड़ित कर अपनी स्थियि दयनीय बनाने की कोशिश करते हैं ताकि कोई तो उसपर तरस खाए। पर इससे परे अधिकांश ठुकराए गए युवाओं का रिएक्शन वायलेंट होता है। वे लड़की को बदनाम करने की कोशिश करते हैं। उसके बारे में अनर्गल बातें करने लगते हैं। क्लासरूम में, स्कूल-कालेज, ट्रेन या बार के टायलेट में उसका नाम और टेलीफोन नम्बर लिख देते हैं। लड़की को जलील और बदनाम करने की कोशिश करते हैं। वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं जो वह खूबसूरत चेहरा जला देने की कोशिश करते हैं जिसने उसकी कथित जिन्दगी तबाह की। अब तक बहुत कम ही सही पर कुछ लोग हत्या तक कर रहे हैं। चिंता की बात यह है कि ऐसे लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इस संदर्भ में ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ की याद आती है। इस फिल्म में एक ऐसे युवक को दिखाया गया है जो अपने प्यार से धोखा खाकर अपनी जिन्दगी का अंत कर देना चाहता है। मजाक-मजाक में ही ‘मुन्ना भाई’ उसे समझाने की कोशिश करते हैं कि एक गई तो दूसरी आ जाती है। नाच गाकर माहौल को हलका फुलका करने की कोशिश भी की गई है। पर इसी फिल्म में, यही मुन्नाभाई किसी एक के प्यार में खोया हुआ था। भावनाओं और भावुकता के बारे में उपन्यासकार, कहानीकार और प्रवचनकार चाहे जो कहते हों किन्तु हकीकत यही है कि भावावेग पुरुषों में अधिक होता है। हो सकता है कि इसकी अभिव्यक्ति में वे कमजोर होते हों, बात-बात पर आंसू बहाना उन्हें मंजूर न हो किन्तु इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वे भावनाशून्य होते हैं। इसलिए सभ्य समाज पुरुषों की भावनाओं से खिलवाड़ बंद करे अन्यथा वे कानून बनाते रह जाएंगे और बैग में बंद लाशें बरामद होती रहेंगी।

Sunday, January 9, 2011

सरकारी आतंकवाद

सभ्य समाज उनकी बातें नहीं सुनना चाहता। प्रशासन भी मुंह फेर लेता है। कानून उनकी भाषा नहीं समझता। संविधान उन्हें दृष्टि में रखकर नहीं लिखा गया। वे संख्या में कम हैं किन्तु उनके अंदर भी एक आग जल रही है। इस आग की आंच एटमी फ्यूजन से ज्यादा तेज है। इसकी आंच में वे खुद लंबे समय से दग्ध होते रहे हैं। अब इसकी लपटें औरों को भी झुलसाकर मारना चाहती हैं। वे मुट्ठीभर हैं। इसलिए वे छापामार युद्ध लड़ रहे हैं। वे चोरी या तस्करी के हथियारों का उपयोग कर रहे हैं। दुश्मनों के हथियार उठा कर उसका उपयोग कर रहे हैं। उन्हें कफन की परवाह नहीं। उन्हें कदाचित इसकी भी फिक्र नहीं कि उन्हें कब्र मिलती है या चिता। वे बेखौफ हैं। वे आत्माभिमानी हैं। किसी की दादागिरी नहीं झेल सकते फिर चाहे वह प्रशासन ही क्यों न हो। दरअसल यह सभ्य समाज के लिए आत्ममंथन का वक्त है। हम यह तर्क दे सकते हैं कि सरकार या प्रशासन कानून के दायरे में रह कर काम कर रहे हैं। वे वृहदतर समाज के हित में काम कर रहे हैं। वे आम जनता, राज्य और देश के अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। पर क्या ये दलीलें सही हैं? जिस किसी का भी किसी सरकारी आफिस से पाला पड़ा है, जरा उसकी राय पूछिए। थाने में रिपोर्ट लिखानी हो, बिजली विभाग में आपत्ति दर्ज करानी हो, स्कूल में बच्चे को एडमिशन दिलाना हो, राशन कार्ड हासिल करना हो, अस्पताल में मरीज को दाखिल कराना हो, अदालत में याचिका दायर करनी हो, बस या ट्रेन में सफर करना हो, हर जगह आम आदमी को याचक की भूमिका में रहना पड़ता है। सरकारी कर्मचारी बनते ही आदमी ‘दादा’ बन जाता है। उसके जो मुंह में आए वह बक सकता है। माँ बहन की गालियां दे सकता है। कपड़े उतरवाकर पट्टे लगवा सकता है। पर आप विरोध तक नहीं कर सकते। यदि आपने उसकी मेज भी जोर से थपथपा दी तो आपके खिलाफ सरकारी काम में दखलअंदाजी करने का जुर्म कायम हो सकता है। हाँ! यह कहेंगे कि न्याय के रास्ते खुले हैं किन्तु किसके लिए? अव्वल तो कोई रिपोर्ट ही नहीं लिखेगा। लिख भी लिया तो उसपर कार्यवाही नहीं होगी। मामला अदालत भी चला गया तो पता नहीं कितने सालों में फैसला आएगा। इतना वक्त आम आदमी के पास नहीं है। उसका बीमार बच्चा, उसकी पकी हुई फसल, हवालात में बंद उसकी बेकसूर बीवी या पति के लिए पल-पल दोजख की आग जैसी है। तो फिर गलती कहां है? इसके बारे में सोचना होगा। यह आत्ममंथन का वक्त है। वरिष्ठ आदिवासी नेता नंदकुमार साय ठीक ही कहते हैं कि बातचीत से नक्सल समस्या का सौ प्रतिशत हल संभव नहीं है। क्योंकि वे जानते हैं कि आदिवासी या नक्सली तो अड़ियल हैं ही, सरकार भी कुछ कम नहीं है।

जनता का मतलब

विश्व के विशालतम लोकतंत्र को यह हक है कि वह कुछ शब्दों की परिभाषा बदले। हमने इस हक का पूरा-पूरा लाभ उठाया है। हमने कई शब्दों के मायने बदले हैं और कई शब्दों के मायने बदलने की तरफ लगातार अग्रसर हैं। जैसे समाज का मतलब एक जैसे सरनेम वाले कुछ लोगों का एक समूह है। समाज का मतलब मुट्ठी भर लोग होते हैं जो हजारों लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करते बताए जाते हैं और उनका नाम लेकर शासन प्रशासन को ब्लैकमेल करने की स्थिति में होते हैं। वे चाहें तो अपने आदमियों को पटरियों पर बैठा दें, चाहें तो हाथों में डंडा-झंडा देकर उनसे ट्रैफिक जाम करवा दें। वे चाहें तो भीड़ बनकर सभा को रौशन करें और तालियों की गड़गड़ाहट और जयकारों से माहौल बना दें। लाइसेंस का मतलब कागज को वह टुकड़ा होता है जिसे पाने के लिए तमाम तरह के हथकंडे अपनाने होते हैं और जिसे पाने बाद आप बेखटके बहुत करते चले जा सकते हैं। जनता का मतलब वह भीड़ है जो आपको विशालतम लोकतंत्र की पदवी से विभूषित करती है। और इस भीड़ को साधने की कला लोकतंत्र है। लोकतंत्र के विशेषज्ञ इस भीड़ के मन की बात समझते हैं। भीड़ मतदान करे इससे पहले ही वे नतीजे बता देते हैं। भीड़ मतदान करे या नहीं, इसका फैसला सरकार करती है। सरकार से मतलब उन ब्रांडेड लोगों से है जो कुछ और लोगों को जनता का ठप्पा लगवाकर ऊपर तक लेकर आ सकें। स्कूल का मतलब उन खूबसूरत इमारतोें से है जिसको देखकर अध्ययन अध्यापन के स्तर का अंदाजा लगाया जाता है। जितनी बड़ी बिल्डिंग, उतनी ज्यादा फीस। जितनी ज्यादा नौटंकी उतने ही कम अध्यापन दिवस। स्कूलों का स्थान कोचिंग सेन्टरों ने ले लिया है। सरकारी नियमों से परे कोचिंग सेन्टर अच्छा काम कर रहे हैं। सरकार मानती है कि एक शिक्षक एक साथ 40-45 से अधिक बच्चों को नहीं पढ़ा सकता। लिहाजा सरकार के स्कूलों में प्रतिकक्षा अब 5-10 बच्चे भी नहीं बचे। उलटे कोचिंग सेन्टर में 100 से अधिक बच्चे एक क्लास में पढ़ रहे हैं और नतीजे दे रहे हैं। आईएएस, आईएफएस और आईपीएस सरकारी जमींदार हैं। इनके पास अपने-अपने लठैतों की फौज है। सरकार के नुमाइन्दे इन्हें अपनी जरूरत बताते हैं और ये उसके हिसाब से काम करके देने में सिद्धहस्त होते हैं। यह एक नैसर्गिक सत्य है कि बालक देखकर ज्यादा सीखता है। भारत के हुक्मरानों ने अंग्रेजी हुकूमत को करीब से देखा था। वह उसी तरह काम करती है। आजादी के बाद के 63 सालों में हम राजपरिवारों वाली मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाए। हमने ब्रिटिश शासन की तमाम बुराइयों को तो आत्मसात कर लिया किन्तु उनकी एक भी खूबी नहीं सीख पाए। पर हम मच्छरों की कौम हैं। स्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हो जाएं हम उसमें भी न केवल जिन्दा रहते हैं बल्कि संख्या बल को बढ़ाने की ताकत भी रखते हैं। हम इसी में खुश हैं। हम इसी में खुश हैं इसलिए सत्ता भी बेफिक्र है।