Monday, May 3, 2010
एलियन्स हमारे आस-पास
एलियन बोले तो बाहरी। इंसानों के परिप्रेक्ष्य में दूसरी दुनिया के प्राणी। हाल ही में चोटी के विज्ञानियों ने एलियन्स की उपस्थिति को स्वीकार किया है। वे कहते हैं कि पृथ्वी से बाहर के सफर के दौरान हमारी एलियन्स से मुलाकात हो सकती है। दूसरे ग्रहों या उनके चांद पर एलियन्स हो सकते हैं। वहां भिन्न प्रकार का वातावरण है इसलिए वहां के प्राणी भी अलग-अलग तरह के होंगे। जहां तेजाब के बादल या झील हैं वहां का प्राणी कांच जैसे तत्वों से बना होगा जो संभव है पारदर्शी हो। इसी तरह जहां का वातावरण बेहद ठंडा है वहां के प्राणियों का विकास बेहद धीमा होगा। हो सकता है उनकी आयु दस हजार वर्ष या इससे भी अधिक हो। वैसे एलियन्स हमारे आस-पास भी मौजूद हो सकते हैं। कभी वे हमें दिखाई देते थे किन्तु हम समझ नहीं पाते थे। हम उन्हें भूत-प्रेत या पिशाच की संज्ञा दे देते थे। कभी-कभी शक होता है कि एलियन्स आज भी हमारे आस-पास हैं किन्तु अब उन्हें पहचानना मुश्किल है। पैर में जूता, हाथों में दस्ताना, चेहरा, माथा सबकुछ साफे में लिपटा, आंखों पर काला चश्मा। भीतर इंसान का बच्चा छिपा है या भूत-प्रेत, किसे पता। सुना है इनकी त्वचा छिले हुए उबले अंडे की तरह होती है। वैज्ञानिक की दृष्टि से देखें तो ये भी एलियन्स ही हैं जिन्हें पृथ्वी की आबोहवा सूट नहीं करती। धरती की धूल से उन्हें एलर्जी हो जाती है। धूल के महीन कण उनके फेफड़ों में कैंसर पैदा कर देते हैं। धूप, धूल और धुआं लगते ही उनकी त्वचा पर फफोले पड़ जाते हैं। ये ‘वाओ.. स्टुपिड.. ईडियट, शिट् जैसे मोनोसिलेबल्स में बातें करते हैं’। वैसे इनकी श्रवण-स्मृति बहुत अच्छी होती है। अंग्रेजी में 17 पाने वाली यह जमात हिन्दी गीतों के अंग्रेजी मुखड़ों को हूबहू दोहराने में सक्षम है, सही एक्सेन्ट के साथ। ये भोजन पर नहीं वरन् नाश्ते और कोल्ड ड्रिंक्स पर जिंदा रह सकते हैं। ये किसी भी कीमत पर अपना वजन नहीं बढ़ने देते, भले ही शरीर का खून सफेद हो जाए। दुपहिया गाड़ियों को ये जिस तरह सड़क पर उड़ाते हैं, वो इंसानों के बस का तो नहीं लगता। इनकी सबसे बड़ी क्षमता अलग-अलग तरह की आवाजों के शोर के बीच अपने मतलब की आवाज को सुन लेने की है। कोलाहल चाहे कितना भी क्यों न हो, ये अविचलित भाव से मोबाइल पर बतिया सकते हैं। चारों तरफ बजते कानफोड़ू गीत-संगीत के बीच इनका अपना मोबाइल एमपी-3 प्लेअर बजता रहता है और ये उसका आनंद भी ले रहे होते हैं। समझ में नहीं आता कि यह हमारी अगली पीढ़ी है या बदलती दुनिया की नई नस्ल जो खुद को आने वाले समय के लिए तैयार कर रही है। कम से कम भोजन, पानी न के बराबर, छोटी सीट की बाइक पर तीन की सवारी, रेगिस्तानों वाली पोशाक और बावरिया संगीत।
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