Thursday, April 29, 2010
मम्मी के पास जाऊंगा
ट्रेन में काफी भीड़ थी। बैठने को जगह नहीं थी। बच्चे इधर-उधर औरों की गोद में बैठा दिए गए थे। लोग बच्चों से खेल रहे थे, उनकी तोतली बोली का आनंद ले रहे थे। उन्हें रिझाने के लिए खुद भी तुतला रहे थे। बच्चे खूब हिल-मिल गए थे। अगले स्टेशन पर हमें उतरना था। लोगों ने खूब कहा किन्तु बच्चों ने उनकी एक नहीं सुनी। उनके जगमग चिकने चेहरे, उनकी चमचमाती साड़ियां, उनके नर्म मुलायम शॉल कुछ भी बच्चों को ज्यादा देर तक नहीं पकड़े रह सके। ‘मां के पास जाऊंगा’ की उसने ऐसी रट लगाई कि लोगों की एक नहीं चली। बच्चों को अपनी सांवली, ऊंचे दांत वाली माँ की गोद और उसके जिस्म की गर्मी इन टुच्ची चीजों से कहीं अधिक प्यारी थी। भले ही माँ उन्हें अनुशासन में रखने के लिए सख्ती करती थी। कभी-कभी एकाध चपत लगा भी देती थी। बावजूद इसके वह उनकी माँ थी। एक अटूट रिश्ता, एक अटूट बंधन, उन्हें एक दूसरे से बांधे रखा था। बच्चे भगवान का स्वरूप होते हैं। उनका सरल मन भी जीवन के सत्य को जानता है। वह प्रलोभन से आकर्षित जरूर होता है किन्तु उसमें फंसता नहीं। वह परायों की गोद में खेलता है, उनका दिया खाता भी है, उनसे बतियाता भी है किन्तु खुद को कभी पूरी तरह उनके हवाले नहीं करता। जब कभी धर्म प्रचारकों को देखता हूँ तो बच्चों का यह एपिसोड याद आ जाता है। दरअसल ये धर्म नहीं बल्कि पंथ प्रचारक होते हैं। दुनिया का धर्म तो एक ही है। प्राणी मात्र से प्यार करो, हिंसा मत करो, कमजोर की मदद करो, बड़ों का सम्मान करो, झूठ मत बोलो, ईश्वर को याद करो। अलबत्ता पंथ अलग-अलग हैं। तेरी साड़ी मेरी साड़ी से सफेद कैसे, तेरे पप्पू की हाईट बढ़ी डेढ़ सेन्टीमीटर और मेरे गप्पू की तीन सेन्टीमीटर जैसे बेतुके काम्पिटीशन में फंसकर लोग इधर से उधर और उधर से किधर, होते फिर रहे हैं। हाथ कुछ नहीं आ रहा। यहां से गए तो इन्होंने दरवाजे बंद कर लिये। जहां गए वो कहते हैं कि तू अपनों का न हुआ तो मेरा क्या होगा। इसलिए सोचिए, अपने स्व को पहचानिये, ईश्वर हमेशा आपके साथ है। वह किसी मध्यस्थ या दलाल का मोहताज नहीं। एकांत में, जंगल में, संडास में, पूजाघर में जहां कहीं भी आप अपने ईश्वर को याद करेंगे, वह आपके साथ होगा। यह उसका धर्म है। आप भले ही भटक जाएं वह नहीं भटकता। वह अपने धर्म से विचलित नहीं होता। वह प्रत्येक प्राणी के साथ है। इंसान को सोचने समझने की शक्ति उसने अपने मनोरंजन के लिए दी है। दिमाग वाला इंसान उसे पाने के लिए तरह-तरह के जुगत भिड़ाता है। ऊंचे-ऊंचे भवन, चिकनी चिकनी फर्शें बनवाता है, बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं गढ़ता है। भगवान को आवाज देकर उसमें प्रवेश करने को कहता है। वह उसे नहलाता है, खिलाता है, सुलाता है। जन्म देता है, विसर्जन करता है। कोई अपने भगवान को चमत्कारी बाजीगर बताता है तो कोई अपने भगवान को बलशाली। ईश्वर ज्यादा अक्ल वालों के पाखण्ड और सरल अनुयायियों की बाल सुलभ हरकतों को देखता है और आनंदित होता है।
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